पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४६२

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परिशिष्ट
 


देखकर वात्सल्य-स्नेहवश, इसकी इच्छा हुई थी कि मैं इस बालकको पुत्र बनाकर अपने स्तनोंका दूध पिलाती। अन्तर्यामी भगवान् उसकी मनोवाञ्छा जान गये। वह अप्सरा किसी घोर पापके कारण पूतना नाम्नी राक्षसी बनी। श्रीकृष्णावतार में भगवान्ने वत्सवत् उसका स्तन्यपान करते हुए उसे वर्ग भेज दिया।

सिसुपाल―

यह चेदि देशका राजा था। यह बडा ही पराक्रमी था। कहते हैं कि रावण ही दूसरे जन्म में शिशुपाल हुआ। यह बडा दुष्ट था। प्रतिदिन सवेरे उठकर भगवान् श्रीकृष्णको सौ गालियाँ दिया करता था। भगवान् कृष्ण उसकी गालियाँ सुनते और सह लेते थे। क्योंकि उसकी माता श्रीकृष्णके पिताकी वहिन थी। और उसने श्रीकृष्णसे यह वर ले लिया था कि वह शिशुपालके सौ अपराधोंको प्रतिदिन क्षमा कर देंगे। एक दिन पाण्डवोंकी सभामें श्रीकृष्णको वह गालियाँ देने लगा। सौ गालियोंतक तो भगवान्ने उसे क्षमा किया! परन्तु जब उसने गाली देना बद नहीं किया तो भगवान्ने चक्रसुदर्शनसे उसके सिरको काट डाला। देखते-देखते उसकी आत्मज्योति भगवानके श्रीमुखमे प्रवेश कर गयी।

व्याध―

भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें पद्मके चिह्न देखकर उसे नेत्रका भ्रम हो गया था और उसने हरिण समझकर भगवान्के चरणों में तीर मारा था। पीछे जब वह समीप आया और चतुर्भुज भगवान् श्रीकृष्णको देखा तो उसे बड़ा ही दुःख और पश्चात्ताप हुआ परन्तु भगवान्ने उसे शान्ति प्रदान करते हुए सदेह स्वर्गको भेज दिया।