पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४६६

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४७१ परिशिष्ट आकाशवाणी हुई कि यह अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मरेगा। इसे समुद्रके फेनसे मारो।' पीछे समुद्रके फेनसे मृत्यु हुई। २४७-पूजियत गनराउ- एक बार सब देवताओंमे इस बातके लिये झगड़ा उठा कि सबोम प्रथम पूज्य कौन है । अन्तमे यह निश्चय हुआ कि समस्त ब्रह्माण्डकी परिक्रमा करके जो पहले आ जाय वह सर्वप्रथम पूज्य 'समझा जायगा । सब देवता अपने-अपने वाहनपर सवार होकर निकले । बेचारे गणेशजीकी सवारी चूहा। क्या करते ? बडे ही असमंजसमे पड़े। इतने में नारदजी उस रास्तेसे होकर निकले। गणेशजीको मनमारे बैठा देखकर उन्होने कहा-किस चिन्तामें आप पडे हैं, रामनाम लिखकर उसकी ही परिक्रमा करके निश्चिन्त हो जाइये । रामनाममें ही अखिल सृष्टि निहित है। फिर क्या था गणेशजीने चट रामनाम लिखकर उसकी परिक्रमा कर डाली और सबसे पहले ब्रह्माण्डकी परिक्रमा कर आनेके फलस्वरूप सर्वप्रथम पूज्य हो गये। यह रामनामकी महिमा है। महिमा जासु जान गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥ रोक्यो विध्य- कथा आती है कि विन्ध्याचल-पर्वत बहुत ही ऊँचा था। सूर्यकी प्रचण्ड किरणें जब उस पर्वतके आश्रय रहनेवाले वृक्ष-लताओं- को झुलसने लगी तब उसे बड़ा रोष उत्पन्न हुआ और सूर्यनारायणको ढक लेनेके उद्देश्यसे वह अपने शरीरको बढ़ाने लगा। इससे सारे पवता भयभीत हो उठे और सबने आकर अगस्त्य ऋषिसे प्रार्थना