पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४८ विनय-पत्रिका जयति लसदंजनाऽदितिज, कपि-केसरी कश्यप-प्रभवा जगदार्तिहर्ता । लोक-लोकप-कोक-कोकनद-शोकहर, हंस हनुमान कल्याणकर्ता।। जयतिसुविशाल-विकराल-विग्रह, वज्रसार साग भुजदण्ड-भारी कुलिशनख. दशनवर लसत, वालधि वृहद, वैरि-शस्त्रास्त्रधर कुधरधारी ॥३॥ जयति जानकी-शोच-संताप-मोचन) रामलक्ष्मणानंद-चारिज- विकासी। कीश-कौतुक केलि-लूम-लंका दहन दलन कानन तरुण तेजरासी जयति पाथोधि-पाषाण जलयानकर, यातुधान-प्रचुर-हर्ष-हाता। दुष्टरावण-कुम्भकर्ण-पाकारिजित-मर्मभित्-कर्म-परिपाक दाता ।५। जयतिभुवनकभूषण, विभीषणवरद, विहितकृत राम-संग्राम साका पुष्पकारूढ़ सौमित्रि-सीता-सहित, भानुकुल-भानु-कीरति-पताका जयति पर-यंत्रमंत्राभिचार-प्रसन, कारमन-कूट-कृत्यादि-हंता । शाकिनी-डाकिनी-पूतना-प्रेत-बेताल-भूत-प्रमथ-यूथ-यंता ॥७॥ जयति वेदान्तविद विविध-विद्या-विशद, वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी शान-विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो, विमल गुण गनति शुकनारदादी जयति काल-गुण-कर्म-माया-मथन, निश्चलशानव्रत, सत्यरत, धर्मचारी। सिद्ध-सुरवृंद-योगींद्र-सेवित सदा, दास तुलसीप्रणत भय-तमारी भावार्थ-हे हनुमान्जी । तुम्हारी जय हो। तुम बदरोंके राजा, सिंहके समान पराक्रमी, ठेवताओंमें श्रेष्ठ, आनन्द और कल्याणके स्थान तया कपालधारी शिवजीके अवतार हो । मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टोंसे व्याप्त घोर ससाररूपी अन्धकारमयी रात्रिके नाश करनेवाले