पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/५७

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विनय-पत्रिका हाँक सुनत दसकंधके भये बंधन ढीले। सो चल गयो किधों भये अब गरवगहीले ॥३॥ सेवकको परदा फटे तू समरथ सीले। अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सही ले ॥४॥ साँसति तुलसीदासकी सुनि सुजस तुही ले। तिहूँकाल तिनको भलो जे राम-रँगीले ॥५॥ भावार्थ-हे हठीले ( भक्तोंके कष्ट बरबस दूर करनेवाले) हनुमान् ! तुझे ऐसा नहीं चाहिये । श्रीराम-सरीखे तो कहीं खामी नहीं हैं और तेरे समान कहीं सहायक नहीं हैं ॥१॥ यह होते हुए भी आज तेरे देखते-देखते मुझ सिंहके बच्चेको (तुझ सिंहरूप सहायकके शरणागत मुझ वालकको) कलियुगरूपी मेंढक ( जिसकी तेरे सामने कोई हस्ती नहीं है ) निगले लेता है। मालूम होता है, इस कलियुगने तेरे भक्तवत्सलता, शरणागतकी रक्षाके लिये हठकारिता, उदारता आदि गुणोंको कील दिया है ॥ २॥ एक दिन तेरी हुंकार सुनते ही रावणके अङ्ग-अङ्गके जोड़ ढीले पड़ गये थे, वह तेरा बल-पराक्रम आज कहाँ गया ? अथवा क्या तू अब दयालुके बदले घमडी हो गया है।॥ ३ ॥ आज तेरे सेवकका पर्दा फट रहा है, उसे तू सी दे,-जाती हुई इज्जतको बचा दे, तू बड़ा समर्थ है, पहले तो तू सेवकको अपनेसे अधिक मानता, उसकी सुनता और सहता था, पर अव क्या है गया ॥ ४॥ इस तुलसीदासके संकटको सुनकर उसे दूर करके यह सुयश तू ही ले ले । वास्तवमें तो जो रामके रेंगीले भक्त हैं उनका तीनों कालोंमें कल्याण ही है ॥ ५॥