पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/६२

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विनय-पत्रिका मातु-पिता,गुरुगनपति सारदासिवा-समेत संभु,सुक,नारद ॥३॥ चरन वंदि विनवौं सव काहू । देहु रामपद-नेह-निवाहू ॥४॥ बंदों राम-लखन-वैदेही । जे तुलसीके परम सनेही ॥ ५॥ - भावार्थ-पवनकुमार हनुमान्जी कल्याणकी मूर्ति हैं । वे सारी बुराइयोंकी जड़ काटनेवाले हैं ॥ १ ॥ पवनके पुत्र हैं, सतोंका हित करनेवाले हैं। अवधविहारी श्रीरामजी सदा इनके हृदयमे विराजते हैं ॥२॥ इनके तथा माता-पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वतीसहित शिवजी, शुकदेवजी, नारद ॥ ३ ॥ इन सबके चरणों- में प्रणाम करके मैं यह विनती करता हूँ कि श्रीरघुनाथजीके चरण- कमलोंमे मेरा प्रेम सदा एक-सा निबहता रहे, यह वरदान दीजिये ॥४॥ अन्तमें मैं श्रीराम, लक्ष्मण और जानकीजीको प्रणाम करता हूँ, जो तुलसीदासके परमप्रेमी और सर्वख है ॥ ५ ॥ लक्ष्मण-स्तुति दण्डक [ ३७ ] लाल लाडिले लखन, हित हौ जनके। सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी, पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥ धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार, अवतार साहसी सहसफनके ॥ सत्यसंध, सत्यव्रत, परम धरमरत , निरमल करम वचन अरु मनके ॥ २॥