पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/६७

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विनय-पत्रिका ६८ भावार्थ-बडे भाग्यवान् श्रीभरतजीकी जय हो, जो जानकीपति श्रीरामजीके चरणकमलोंके मकरन्दका पान करनेके लिये रसिक भ्रमर हैं । जो ससारके भूषणखरूप, सूर्यवेशके विभूषण और नृप- शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीके पूर्ण प्रेमी हैं ॥१॥ भरतजीकी जय हो, जिन्होंने इन्द्र, कुवेर आदि लोकपालोंको भी जो अत्यन्त दुर्लभ हैं, ऐसे महान् सुखप्रद महाराज्य और साम्राज्यसे मुख मोड़ लिया । जिनका सेवाव्रत तलवारकी धारके समान अति कठिन है ऐसे सत्- पुरुपोंमें भी जो सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं और जिनकी शुद्ध बुद्धिरूपी तरुणी स्त्री श्रीरामरूपी स्वामीके प्रेममें लवलीन है.॥ २॥ भरतजीकी जय हो, जो निष्कपट भक्तिभावके अधीन होकर प्रिय भाई श्रीराम- चन्द्रजीके लिये चित्रकूट-पर्वतपर पैदल गये, जो श्रीरामजीकी पादुका- रूपी राजाके मन्त्री बनकर पृथ्वीका पालन करते रहे और जो राम- सेवारूपी परम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले तथा बडे भारी वीर हैं ॥ ३ ॥ श्रीलक्ष्मणजीको शक्ति लगनेपर संजीवनीबूटी लानेके समय, जब भरतजीके बाणसे व्यथित होकर हनुमान्जी गिर पडे तब उन्होंने जिन भरतजीके धनुष-बाणकी बडी बडाई की थी, जिनकी भुजाओंका बडा भारी बल है, जिनका अनुपम पराक्रम है, जिनकी गूढ़ गतिको श्रीजानकीनाथ रामजी ही जानते हैं ऐसे भरतजीकी जय हो ॥ ४ ॥ जिन्होंने रणाङ्गणमें गन्धोंका गर्व खर्व कर दिया और फिरसे उन्हें श्रीरामकी गुण गाथाओंका गानेवाला बनाया, ऐसे भरतजीकी जयहो ।माण्डवीके चित्तरूपी चातकके लिये जो नवीन मेघ- वर्ण हैं, ऐसे अभय देनेवाले भरतजीकी यह तुलसीदास शरण है ॥ ५॥