पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९०

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विनय-पत्रिका दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, वर्ग-अपवर्ग-पति,भग्नसंसार-पादप, कुठारं। शापवश मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, यश-रक्षण-दक्ष, पक्षकर्ता । जनक-नृप-सदसिशिववाप-भंजन, उग्र-भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥ गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य त्यक, श्रीसहित सौमित्रि- भ्राता। सग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-वध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥ ५॥ दंडकारण्य कृतपुण्य पावन चरण, हरण मारीच-मायाकुरंग। वालिवलमत्त गजराज इव केसरी,सुहृद-सुग्रीव-दुख-राशि-भंग। ऋक्ष,मर्कटविकट सुभट उद्भट समर,शैल-संकाशरिपुत्रासकारी बद्धपाथोघि, सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजबील भारी॥७॥ दुष्टविवुधारि-संघात, अपहरण महि-भार, अवतार कारण अनूपं । अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सगुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप- रूपं ॥ ८॥ शेष-श्रुति-सारदा-संभु-नारद सनक गनतगुन अंत नहि तव चरित्र सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदादासतुलसी-त्रास-निधि- वहिनं ॥९॥ भावार्थ-सूर्यवंशरूपी कमलको खिलानेके लिये जो सूर्य है, करोड़ों कामदेवोंके समान जिनकी सुन्दरता है, कलिकालरूपी सर्पको असनेके लिये जो गरुड़ हैं, अपने प्रबल भुजदण्डोंमें जिन्होंने प्रचण्ड धनुष और बाण धारण कर रखे हैं, जो तरकस बॉधे हैं और जिनका वल असीम है ॥ १॥ लाल कमलकी पंखुड़ियों-जैसे जिनके नत्र हैं, जो शोभाके धाम हैं, जिनके सॉवरे शरीरकी सुन्दर कान्ति