पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९१

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विनय-पत्रिका ' मेधके समान है। जो तपे हुए सोनेके समान पीताम्बर धारण किये हैं, जो शस्त्र-विद्यामें निपुण और सिद्धों तथा देवताओंके उपास्य है। और जिनकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ है ॥२॥ जो सम्पूर्ण सुन्दरताके स्थान हैं, सारा विश्व ही जिनकी मूर्ति है, जो बड़े ही बुद्धिमान् और रहस्यमय गुणवाले है, जिनकी अपार महिमा है, जिनको कोई भी नहीं जीत सकता और जिनकी लीलाका पार कोई भी नहीं पा सकता, जिनको पहचानना बडा कठिन है, जो स्वर्ग और मोक्षके खामी तथा आवागमनरूपी संसारके वृक्षकी जड़ काटनेके लिये कुठार हैं ॥ ३ ॥ जो गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याको शापसे मुक्त करनेवाले, विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेमें बड़े चतुर और अपने भक्तोंका पक्ष करनेवाले हैं तथा राजा जनककी सभामें शिवजीके धनुषको तोडकर महान् तेजस्खी एवं क्रोधी परशुरामजीके गर्व और महत्त्वको हरण करनेवाले हैं ॥ ४॥ जिन्होंने पिताके वचनोंका गौरव रखनेके लिये, देवता भी जिसको बडी कठिनतासे छोड़ सकते हैं, ऐसे राज्यको सहजमें ही त्याग दिया और भाई लक्ष्मण तथा श्रीजानकीजीको साथ लेकर, अजन्मा, परब्रह्म होकर भी नरलीलासे तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये रावणादि दुष्ट राक्षसोंका संहार किया ॥ ५॥ जिन्होंने अपने पावन चरणकमलोंसे दण्डक वनको पवित्र कर दिया, कपट-मृगरूपी मारीचका नाश कर दिया, जो बालिरूपी महान् बलसे मतवाले हाथीके सहारके लिये सिंहरूप हैं और सुग्रीवके समस्त दु.खोंका नाश करनेवाले परम सुहृद् हैं ॥ ६ ॥ जिन्होंने भयंकर और बडे भारी शूरवीर रीछ-बंदरोंको साथ लेकर सग्राममें कुम्भकर्ण-सरीखे पर्वतके समान आकारवाले योद्धाओंको डरा