पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९३

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९४ विनय-पत्रिका भ्रमत आमोदवश मत्तमधुकर-निकर,मधुरतर मुखर कुर्वन्ति गानं सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकण, हार, किंकिणी-रटनि कटि तट रसालं। वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं कनक-मृदुवल्लिवततरु तमालं आजानुभुजदंड कोदंड-मंडित वाम बाहु, दक्षिण पाणि चाणमेक। अखिल मुनि-निकर सुर, सिद्ध,गंधर्व,वरनमत नर नाग अवनिप अनेकं ॥७॥ अनघ, अविछिन्न, सर्वज्ञ, सर्वेश, खलु सर्वतोभद्र-दाताऽसमाकं । प्रणतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुण नौमिश्रीरामसौमित्रिसाल युगल पदपन सुखसमपद्मालयं, चिन्ह कुलिशादिशोभाति भारी। हनुमंत-हृदि विमल कृत परममंदिर, सदा दासतुलसी-शरण शोकहारी ॥९॥ भावार्थ-जानकीनाथ श्रीरघुनाथजी राग-द्वेषरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये सूर्यरूप, तरुण शरीरवाले, तेजकेधाम, सच्चिदानन्द, आनन्दकन्दकी खानि, ससारको शान्ति देनेवाले परम सुन्दर हैं ॥१॥ जिनकी नवीन नील सजल मेधके समान सुन्दर और शुभ कान्ति है, जो कटि-तटमें सुन्दर रेशमी पीताम्बर धारण किये हैं और जिनके मस्तकपर सैकडों सूर्योंके समान प्रकाश करनेवाला रत्नजडित सुन्दर सुवर्ण-मुकुट शोभित हो रहा है ॥ २॥ जो कानोंमे कुण्डल पहिने, भालपर तिलक लगाये, अत्यन्त सुन्दर भ्रुकुटि तथा लाल कमलके समान वडे-बडे नेत्रोंवाले, तिरछी चितवनसे देखते हुए, तीनों लोकोंका शोक हरनेवाले और कामारि श्रीशिवजीके हृदयरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाले हसरूप हैं ॥ ३ ॥ जिनकी नासिका बडी सुन्दर है, मनोहर कपोल हैं, दॉत हीरे-जैसे चमकदार हैं,