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पृष्ठ:विवेकानंद ग्रंथावली.djvu/१५९

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प्रकार के योगों का संस्कृत में अलग अलग नाम है। जो इस प्रकार के योग का अभ्यास करता है, उसे योगी कहते हैं। काम करनेवाले को कर्म-योगी कहते हैं। जो भति वा प्रेम द्वारा योग करता है, भक्तियोगी कहलाता है। जो गूढ़ तत्व द्वारा योग को जिज्ञासा करता है, वह राजयोगी कहलाता है। जो दर्शन के द्वारा योग चाहता है, उसे ज्ञानयोगी कहते हैं। अतः योगी शब्द में सबका समावेश है।

पहले हम राजयोग को लेते हैं। राजयोग क्या है? मन का वशीभूत करना किसे कहते हैं? इस देश में योगी शब्द से संसार भर के ऐरे गैरे लिए जाते हैं; इसलिये मुझे भय है कि आप कहीं कुछ और न समझ लें। यही कह देना पर्याप्त है कि इन बातों का योगी से कोई संबंध नहीं है। इन योगों में कोई युक्ति को नहीं त्यागता और न आपसे यह कहता है कि आप युक्ति-प्रमाण को तिलांजलि देकर, आँखें मूँँदकर किसी प्रकार के पंडे-पुजारी के हाथों में पड़ें। प्रत्येक का यही कथन है कि आप अपने युक्ति प्रमाणों को लिए रहिए, उन पर डटे रहिए। हमें सब प्राणियों में तीन प्रकार के ज्ञान के साधन मिलते हैं। उनमें पहला सहज ज्ञान है। यह कम विकास-प्राप्त प्राणियों में पाया जाता है। ज्ञान का दूसरा साधन बुद्धि है। यह अत्यंत उन्नति-प्राप्त है और मनुष्यों ही में मिलती है। पहले तो सहज ज्ञान एक भोंडा साधन है; पशुओं में उसका कार्य्यक्षेत्र बहुत ही संकुचित रहता है और उसीके भीतर वह अपना काम