(२७०) पर सम्राट फिर बोलने लगे “सुनते चलो, तर्क वितर्क का समय नहीं है। शशांक लौटेंगे, पर मेरे भाग्य में अब उनका मुँह देखना नहीं लिखा है । शशांक के लौटने पर उन्हें सिंहासन पर बिठाना । विनय !" महाप्रतीहार विनयसेन सामने आए। सम्राट ने कहा "झटपट गरुड्- ध्वज लाओ । हृषीकेश कहाँ है ?” विनयसेन ने उत्तर दिया “दूसरे घर में है" | विनयसेन गरुड़ध्वज लाने गए। सम्राट ने कहा "यशोधवल ! अब मैं मरता हूँ। जब तक शशांक लौटकर न आएँ तब तक राज्यभार न छोड़ना, नहीं तो माधव साम्राज्य का सत्यानाश कर देगा। गरुड़ध्वज हाथ में लिए विनयसेन आ पहुँचे। सम्राट महादेवी की सहायता से उपधान का सहारा लेकर बैठे और बोले "यशोधवल ! गरुड़ध्वज छूकर शपथ खाओ कि जबतक शशांक न आजाँयगे तब तक राज्य का भार न छोड़ेंगे। यशोधवलदेव ने गरुड़ध्वज छूकर शपथ खाई। सम्राट ने फिर कहा देवि ! तुम सहमरण का विचार कभी न करना। तुम्हारा पुत्र लौटकर आएगा। जब पुत्र सिंहासन पर बैठ जाय तब चिता पर बैठना” | महादेवी ने सम्राट के चरण छूकर शपथ खाई । तब सम्राट ने प्रसन्न होकर अमात्यों को बुलाने की आज्ञा दी। थोड़ी देर में हृषीकेश शर्मा, हरिगुप्त, रामगुप्त, रविगुप्त, और माधवगुप्त शयनागार में आए । महासेन गुप्त उस समय शिथिल पड़ गए थे । बुझने के पहले एक बार वृद्ध का जीवन-प्रदीप फिर जग उठा । वे बोले "नारायण ! मेरा क्षीण स्वर हृषीकेश के कानों तक न पहुँचेगा । मैं जो कुछ कहता हूँ उन्हें समझा दो। यह क्षत्र, दंड और सिंहासन तुम लोगों के हाथ सौंपता हूँ। शशांक जीवित हैं और अवश्य लौटकर आएँगे। उनके लौटने पर उन्हें सिंहासन पर बिठाना । जब तक वे
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