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पृष्ठ:संक्षिप्त रामचंद्रिका.djvu/२५३

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( २०३ )

⁠यत्र तत्र ध्वजा पताका दीह देहनि भूप ।
⁠टूटि टूटि परे मनौ बहु बात वृक्ष अनूप ।। २४०॥
⁠पुज कु जर सुभ्र स्यंदन सोभिजै सुठि सूर ।
⁠ठेलि ठेलि चले गिरीसनि पेलि सोनित पूर ।।
⁠ग्राहतु ग तुरग कच्छप चारु चर्म विसाल ।
⁠चक्र से रथचक्र पैरत गृद्ध वृद्ध मराल ।। २४१ ।।
⁠केकरे कर बाहु मीन गयद सुड भुजग।
⁠चीर चौर सुदेस केस सिबाल जानि सुरग॥
⁠बालुका बहु भाँति हैं मनिमाल जाल प्रकास ।
⁠पैरि पार भये ते द्वै मुनिबाल केसवदास ॥ २४२ ॥
[दो०] नामबरण लघु वेप लघु, कहत रीझि हनुमत ।
⁠इतो बडो विक्रम किया, जीते युद्ध अनत ॥ २४३ ।।
⁠⁠⁠[तारक छट]
भरत-हनुमंत दुरत नदी अब नाषौ ।
⁠रघुनाथ सहोदर जी अभिलाषौ ।।
⁠तब जो तुम मिधुहि नॉघि गये जू ।
⁠अब नाँघहु काहे न भीत भये जू ॥ २४४ ॥
हनुमान-[दो०] सीतापद सम्मुख हुते, गये सिंधु के पार ।
⁠विमुख भये क्यों जाहुँ तरि,सुनौ भरत यहि बार॥२४५।।
⁠⁠⁠[तारक छ द]
⁠धनु बान लिये मुनिबालक आये।
⁠जनु मन्मथ के युग रूप सुहाये ॥