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सज्जनत का दण्ड
 


इसपर बूढ़े हरिदास ने उपदेश दिया, यारो, स्वार्थ की बात और है। नहीं तो सच यह है कि यह मनुष्य नहीं देवता है। भला और नहीं तो सालभर में कमीशन के १० हजार तो होते होंगे। इतने रुपयों को ठीकरेकी तरह तुच्छ समझना क्या कोई सहज बात है? एक हम हैं कि कौड़ियों के पीछे ईमान बेचते फिरते हैं। जो सज्जन पुरुष हमसे एक पाईका रवादार न हो, सब प्रकार के कष्ट उठाकर भी जिसकी नीयत डावाडोल न हो, उसके साथ ऐसा नीच और कुटिल बर्ताव करना पड़ता है। इसे अपने अभाग्य के सिवा और क्या समझे।

शहबाज़ खाने फरमाया हो, इसमें तो कोई शक नहीं कि यह शख्स नेकीका फरिश्ता है।

सेठ धुन्नीलालने गम्भीरता से कहा, खां साहब बात तो यही है, जो तुम कहते हो। लेकिन किया क्या जाय? नेकनीयती से तो काम नहीं चलता। यह दुनिया तो छल-कपट की है।

मिस्टर गोपालदास बी० ए० पास थे। वे गर्व के साथ बोले, इन्हें जब इस तरह रहना था तो नौकरी करने की क्या जरूरत थी? यह कौन नहीं जानता कि नियतको साफ रखना अच्छी बात है। मगर यह भी तो देखना चाहिये कि इसका दूसरों पर क्या असर पड़ता है। हमको तो ऐसा आदमी चाहिये जो खुद खाय और हमें भी खिलावे। खुद हलुवाखाय, हमें रूखी रोटियाँ ही खिलावे। वह अगर एक रुपया कमीशन लेगा तो उसकी जगह पाँच का फायदा करा देगा। इन महाशय के यहा क्या है? इसलिये आप जो चाहे कहें, मेरी तो कभी इनसे निम ही नहीं सकती।