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सम्पत्ति-शास्त्र।


मानेगा। यदि मालगुजारी ज़ियादह नहीं तो फिर क्या कारण है जो हजारों लाखों रुपकों के बैल बधिये बिक जाते हैं और लाखों एकड़ ज़मीन नीलाम हो जाती है ? आप देहात में जाकर देखिए, सौ पचासकिसानों में कहीं एक आध आपको ऐसा मिलेगा जिसे रोटी, कपड़े की तकलीफ़ न हो। यह हम समय-सुकाल की बात कहते हैं। अकाल में तो जो दृश्य देहात में देख पड़ता है वह बहुत ही हृदयद्रावक होता है। यदि यह मान भी लिया जाय कि लगान की अधिकता अकाल की भीपणता कारण नहीं तो यह प्रश्न उठता है कि अँगरेजी राज्य के पहले भी तो कभी कभी अकाल पड़ता था। पर उस समय प्रजा में इतना हाहाकार क्यों न मचता था ? एक भी फसल मारी जाने या खराब होने से आज कल की तरह क्यों न उस समय लाखों आदमी दाने दाने के लिए तड़पते फिरते थे ? सरकार कहती है कि प्रजा की कंगाली के कारणों में से महाजनों को अधिक सूद देना भी एक कारण है। पर वह यह नहीं सोचती कि यदि किसानों को रुपी से काफी आमदनी होती ना ये महाजनों से कर्ज लेते क्यों ? और न कर्ज लेने तो उन्हें अधिक सूद क्यों देना पड़ता ? सरकार की राय है कि मालगुजारी की अधिकता दुर्भिक्ष का कारण नहीं। पर प्रजा के प्रतिनिधि कहते हैं कि यदि मालगुजारी कम हो जातो तानसा को ज़रूर कुछ बच जाता। और वह बचत दुर्भिक्ष के समय पेट पालने के काम आती। मनुष्य-वृद्धि होने, रेलों और सड़कों के बन जाने, अधिक जमीन में खेती होने, नहरों से आवपाशी करने. और अनाज का निर्ख महँगा हो जाने आदि से सरकार मालगुजारी की मात्रा बढ़ा सकती है। पर इतनी नहीं कि रिमाया को भंग मांगने की नौबत आजाय। यदि कृपों की दुर्दशा का कारण मालगुजारी की ज़ियादती नहीं तो न सही। उनकी दरिद्रता और दुःख के जो कारण सरकार की समझ में ठोक अँचते हो उन्हीं को दूर करके उनको भूखों गरने से बचाये मजा की यथासंभव प्राणा- रक्षा करना सरकार अपना कर्तव्य समझती है या नहीं ? कम सूद पर उसे क़र्ज़ देने का वह प्रबन्ध करे। महाजनों और जमींदारों के चंगुल से उसे बचाये। खर्च कम करने की उसे मुफ़्त शिक्षा दे, जिसमें जिस साल कुछ बचत हो उस बचत को प्रजा अगले साल के लिए रख छोड़े, अनावश्यक कामों में उसे न उड़ादे।