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पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/१९६

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सर्व-साधारण बातें । १७७ अशिक्षितों को नहीं हो सकता । और यदि हो भी तो मैं उनसे यथेष्ट लाभ नहीं उठा सकने । शिक्षा, विद्या और विज्ञान के बल से एक चीज़ें ज़मीन में जितनी पैदावार हो सकती है उतनी अशिक्षित आदमियों के किये कभी नहीं हो सकती । जिस देश में खनिज, रसायन, ऋषि, भूगर्भ आदि विद्याओं के जानने वाले हैं वह देश उन देशों से ज़रूर ही अधिक सम्पत्ति उत्पन्न कर सकेगा जो इन विद्याओं के नहीं जानते । कला-कौशल के विषय में भी यहीं बात कही जा सकती है । किसी किसी देश के रहनेवाले सम्पत्ति की कम परवा करते हैं । यह बात पूर्वी देशों में अधिकतर पाई जाती है । हिन्दुस्तानी की लीजिए: यहां हम लोग सन्तोष की एक बहुत ही श्रेष्ठ गुण समझते हैं, और भाग्य के भरोसे रह कर जो कुछ सुबह से शाम तक मिल जाता है, उसी पर ख़ुशी से गुज़ारा करते हैं । यहां की धार्मिक शिक्षा हो कुछ इस तरह की है । इसी से तो यह कहावत अकसर लोगों के मुँह से सुनने में आती हैं :- आज ग्वाय और कल को भक्खै - उसका गोरख संग न रक्खै । पश्चिमी देशों का हाल इसका उलटा है। वे तक़दीर से सदर को श्रेष्ठ समझते हैं और हमेशा सम्पत्ति के बढ़ाने की फ़िक्र में रहते हैं । सन्तोष को वे बुरी दृष्टि से देते हैं । छोटे से लेकर बड़े तक सब को किसी न किसी तरह का हौसला रहता ही हैं । सन्तोष किसी के किसी बात से नहीं । पूर्वी और पश्चिमी देशों में सम्पत्ति-विषयक यह बात ध्यान में रखने लायक़ है । मज़दूरों और हर पेशे के कारीगरों के चुस्त, चालाक और शिक्षित होने से भी देश की सम्पत्ति बढ़ती है । जहां के कारीगर अच्छा काम कर सकते हैं और पढ़े लिखे होते हैं, जहां के मज़दूर खूब मजबूत होने हैं और शराबी कबाबी नहीं होते, वह देश औरों की अपेक्षा अधिक सम्पत्तिमान् होता है । जिस देश के श्रमजीवी सुस्त, अनपढ़, कमज़ोर और कम समझ होते हैं वह देश बहुत कम सम्पत्ति पैदा कर सकता है । दूरन्देश और ईमानदार कारीगरों से देश को जितना लाभ पहुँचता हैं कम समझ, काहिल और कामचोर कारीगरों से उतनी ही हानि पहुँचती है ! श्रमजीवी आदमियों को यह शिक्षा देना कि विश्वासपात्र, चालाक और दूरन्देश बनने से उन्हीं को नहीं, किन्तु सारे देश को लाभ पहुँच सकता है, देश के सभी शुभ-