पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/८९

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७० सम्पत्ति-शास्त्र । अर्थ में भी क्रोमत, मूल्य या मेल ही शब्द लिखेंगे, क्योंकि "Palun: का अर्थ-बोधक भालियत" या "क़दर" शब्द व्यापार और उद्योग-धन्धे की बातों में कम आता है। तीसरा परिच्छेद । सिक्का ।। समाज की आदिम अवस्था में चीज़ों को हमेशा अदला-बदल होता है । यह बात बतलाई जा चुकी है। इससे अच इस विपय में और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है । अदल-बदल करने में बहुत तकलीफ़ होती हैं । वक्त भी बहुत वराव होता है। इसी से पदार्थों के मूल्य के दर्शक रुपये था सिक्के की सृष्टि हुई है। इससे लेन देन में बड़ा सुभोसा होता है। किसान खेती की पदाचार के बदले, मज़दूर मज़द्दरो के बदले, बुद्धिजीवी बुद्धि के बदलै, गुणवान् गुण के बदले रुपया ऐसा लेने में जरा भी संकोच नहीं करने सब रुपये की चाहते हैं । सर्च द्रव्य को अभिलाषा रखते हैं। इसका कारण है कि रुपया दिखलाते हो सारी व्यावहारिक चीजें चाज़ार में मिल सकती। अतएच रुपयर पसा एक प्रकार का टिकिट या हुक्मन्ह सिके प्रभाव से आदमों को खाने, पाने, पहनने, ओढ्ने आश लामासी-से माप्त हो सकती है. इग्न च ले। इतनादर हैं। सभ्य-समाज के प्रत्येक ग्राद को जी पुग- इतनवा सका यही कारण है कि उसकी बदौलत उनायक दरस हैं। यदि रुपया पदार्थों के मूल्य का निदर्शने । यदि उसमें व्यापक के करने-की- काईन पूँछत कुछ भीकंदर न होती . व्य अर्थात् रुपये पैसे में..न का कोई, गुबा नहीं है। उसके किसी जातीय गुरों के कारण उसकी क़दूर नहीं होती यदि किसी रंगिस्तान, था * समुद्र में जाते हुए जहाज़, में किसी के पास करोड़ रुपये.भी हों, पर वहाँ व्यवहार की चीज़ों का अभाव हो । अतएव रुपया खर्च करने पर भी वे न मिल सकती हों, तो रुपये से कोई लाभ न हो । पदम भूखों मर जाय। रुपये में यद्यपि प्रयेाजनीय चीजें प्राप्त करने की शक्ति है, तथापि वह शक्ति