तुम जैसी मर्जी हो, वैसा करना। मैं जो नीचे लिख रहा हूँ उसे तुम मेरी सलाह- मात्र मानना। मैं तुम्हारे स्वास्थ्यको सुघरा हुआ देखना चाहता हूँ ।
स्वास्थ्यका ही विचार करते हुए मुझे लगता है कि तुम्हारा फीनिक्समें आना उत्तम रहेगा। वहाँ तुम्हें खुली हवा मिल सकेगी। खेतीका काम क्षय रोगीके लिए अच्छा है; उसे भी तुम फीनिक्समें कर सकोगे। इसके अतिरिक्त यह मोह भी है कि मैं जरूर तुम्हारी मदद कर सकूँगा और तुम्हारी कुछ देखभाल भी कर सकूंगा। पर वह तभी सम्भव है, जब तुम फीनिक्समें रहो। इसके अलावा, अगर भगवानकी मर्जी हुई तो तुम इस फार्ममें रह सकोगे। यहाँकी आबोहवा तो फीनिक्ससे भी अच्छी है। तुम जैसे लोगोंके लिए तो ब्रह्मचर्यकी विशेष आवश्यकता है, और उसका पालन यहाँ सहज ही हो सकता है। अतः मुझे लगता है कि तुम्हारा यहाँ आ जाना ठीक रहेगा। यहाँ आराम न हो तो तुम स्वदेश चले जाना। यदि स्वदेश जानेका ही आग्रह हो, तो मैंने डॉक्टर [ मेहता ] को लिखा है कि तुम्हें हर महीने रु० . . .' देते रहें। वैसे भी तुम बम्बईमें रहकर मेरी देखरेखमें सार्वजनिक कार्य कर सकते हो। अभी तो मुख्य कार्य यहाँकी लड़ाईके सम्बन्धमें ही होगा। ऐसा करनेसे तुम जीविकाकी ओरसे निश्चिन्त हो जाओगे और अपना शेष जीवन सहज ही परमार्थमें व्यतीत कर सकोगे । रोग रहे या न रहे, तुम्हारा जीवन देश-कल्याणमें व्यतीत हो, मैं यही चाहता हूँ
और भी बहुत-कुछ लिखनेको है; लेकिन लिखनेका मन नहीं होता। तुम स्वदेश पहुँच गये हो तो भी यहाँ आनेकी मेरी सलाहको स्थिर समझना । यहाँ आनेका विचार न हो, तब भी तुम डॉक्टर [ मेहता ] के विषयमें कही गई मेरी बातपर विचार करना ।
लेकिन, अगर इन दोनोंमें से तुम्हें एक भी रास्ता पसन्द न आये और तुम स्वतन्त्र रूपसे ही जीविकोपार्जन करना चाहो तो मैं दखल नहीं दूंगा, ऐसा समझना । जिस किसी मार्गके अपनानेसे तुम्हारा मन विशेष प्रसन्न रहे, वही मार्ग तुम अपनाओ, यही मेरी इच्छा है।
आनेवाले सप्ताहमें मैं तुम्हारे पत्रकी उसी प्रकार प्रतीक्षा करूँगा जिस प्रकार चातक वर्षा ऋतुकी बाट देखता रहता है।
मोहनदासके आशीर्वाद
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ४९३६) से । सौजन्य : छगनलाल गांधी । १. राशि नहीं दी गई है ।