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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१४

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आठ ऑरेंज फी स्टेटमें प्रवेश करनेवाले शिक्षित एशियाइयोंको हलफिया यह बयान देना पड़ता था कि वे उक्त प्रदेश में खेती या व्यापार नहीं करेंगे कायम रखी गई थी। पत्रोंका आदान-प्रदान हुआ और सदाकी तरह जनरल स्मट्सने कुछ आपत्तियाँ तो हल कर दीं और कुछके बारेमें आश्वासन दे दिये । ता० २४ जूनको, जब कि विधेयकका केवल दुसरा वाचन ही समाप्त हुआ था, संसद् के सत्रका अवसान कर दिया गया और गांधीजीको यह बताया गया कि जबतक सम्बन्धित कानून पास नहीं हो जाता, पिछली सालका अस्थायी समझौता जारी रहेगा और शिक्षित भारतीयोंको, जिनके नाम गांधीजी देंगे, सन् १९१२ में भी प्रवेश दिया जायेगा । गांधीजी श्री गोखलेको बार-बार अत्यन्त आग्रहपूर्वक दक्षिण आफ्रिका आनेका अनुरोध करते रहे थे; २२ अक्तूबरको वे वहाँ आ पहुँचे और केप टाउनमें उतरे । दक्षिण आफ्रिका गोरे और रंगदार, सब लोगोंने रास्तेमें वे जहाँ-जहाँ रुके वहाँ और शहरों के नगर भवनों में उनका शानदार राजकीय स्वागत किया। वे विविध वर्गोंके नेताओं और व्यक्तियोंसे मिले; जगह-जगह उनके भाषण हुए; संघके मन्त्रियों- • बोथा, स्मट्स और फिशरसे उनकी चर्चाएँ हुई और गवर्नर-जनरलके साथ उन्होंने भोजन किया। - गोखलेकी यह यात्रा भारत में दक्षिण आफ्रिकी सवालोंके प्रति लोगोंका ध्यान केन्द्रित करने में बहुत सहायक सिद्ध हुई; इसी प्रकार दक्षिण आफ्रिकामें उसने भारतीयोंका हौसला बढ़ाया और साथ ही लॉर्ड एम्टहिलके शब्दों में उससे " सद्भावनाका वातावरण तैयार" हुआ (पृष्ठ ४९४) । गोखले से मिलने के बाद लॉर्ड ग्लैड्स्टनने शाही सरकारको अपनी इस भेंट के बारेमें जो टिप्पणी (देखिए परिशिष्ट २२) लिखी थी उसमें श्री गोखलेकी यात्राके सुपरिणामोंका सारांश आ जाता है। प्रवेश और अधिवास-सम्बन्धी विषम प्रश्न तो इसके बाद सुलझ गये मालूम हुए किन्तु भारतीयोंका उत्पीड़न और दमन दूसरे बहानोंसे जारी ही रहा। उस समय तक यह रिवाज चला आता था कि जायदाद होती तो थी ऐसे गोरोंके नामपर जो सम्बन्धित भारतीयोंके जाने-पहचाने मित्र होते थे किन्तु उसका उपयोग वे भारतीय करते थे और उसपर न्याय-मान्य (इक्वीटेबिल) स्वामित्व भी उन्हींका होता था। अब सुवर्ण-कानून और कस्बा - कानूनके द्वारा इस रिवाजको नष्ट करनेकी कोशिश की जाने लगी। क्लार्क्सडॉर्प, क्रूगर्सडॉर्प, रुडीपूर्ट और फ्रीडीडॉर्प कस्बों में क्रमशः बाड़ोंके गोरे मालिकोंको सुवर्ण-कानूनके तहत अपने रंगदार आभोगियोंको निष्कासित करनेके नोटिस दिये गये । व्यापारियोंको अपने व्यापारिक परवाने दूसरोंके नाम बदलवानेकी इजाजत नहीं दी गई। ट्रान्सवाल म्यूनिसिपल अध्यादेश के प्रारूप में म्यूनिसिपैल्टियोंको फेरीवालोंके परवानोंके नियमनका पूरा अधिकार दे दिया गया था; उन्हें एशियाइयोंकी पृथक वस्तियों से खिलवाड़ करनेकी सत्ता भी मिल गई थी। इस प्रकार, व्यापारीके मरने या निवृत्त होनेपर उसके परवानेको रद करके अथवा जिस बस्ती में वह व्यापार करता था वहाँसे उसे किसी दूसरी और घटिया जगह जानेके लिए बाध्य करके भारतीयोंके कारोबारको चौपट करनेका संगठित प्रयत्न किया गया। इसके सिवा भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीयोंपर तीन- पौंडी कर भी लगता ही रहा । Gandhi Heritage Portal