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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२६७

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८. तीन पौंडी कर २३१ क्या कानूनी सलाहकार महोदय कृपया प्रस्तुत सामान्य कानूनकी तुलना उन कानूनोंसे करेंगे जिनका यह स्थान लेता है, और बतायेंगे कि अन्य प्रकारसे यह किस सीमा तक प्रजाकी आजादी और भी प्रतिबन्धित करता है ? मो० क० गांधी टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६२६-७ ) की फोटो - नकलसे । १९५. तीन पौंडी कर' सर्वोच्च न्यायालयकी सम्पूर्ण न्यायपीठ (फुल बैंच) का एक निर्णय' इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित किया जा रहा है। उससे जाहिर है कि ऐसे हर भारतीयको, जो दूसरी बार गिरमिट स्वीकार करता है, १९१० के अधिनियम १९ के अनुसार ३ पौंड वार्षिक देकर गिरमिटका परवाना लेना होगा। इसका मतलब यह है कि जो लोग १९१०के अप्रैलमें जारी की गई सरकारी गश्ती चिट्ठी पढ़कर दुबारा गिरमिट स्वीकार कर बैठे, वे सब बुरी तरह धोखा खा गये हैं। इस अधिनियमका उद्देश्य चाहे जो रहा हो, तथ्य यह है कि जो हजारों भारतीय दुबारा नई गिरमिटमें शायद पूर्णतया यह विश्वास कर लेनेके कारण ही बँधे हैं कि इससे उन्हें बकाया रकम और चालू देनदारी, दोनोंसे छुटकारा मिल जायेगा । केवल इन गरीब और भोले लोगोंने ही ऐसा नहीं समझा, सरकारी विभागोंने भी इसका यही अर्थ लगाकर कार्रवाई की है। जान पड़ता है, कुछ महीने हुए, विधि-विभागने उन सभी लोगोंपर, जिन्होंने चालू परवानेका १. देखिए "तीन पौंडी कर", पृष्ठ १७३-७६ । २. फरवरी १, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालयके नेटाल प्रभाग (डिवीजन) ने टुगेला डिवीजनके मजिस्टेट के निर्णयके विरुद्ध एन० मूढलेकी अपीलपर विचार किया । मजिस्टेटने निर्णय दिया था कि मूडलेको तीन पौंडी कर देना पड़ेगा । अपीलकर्ताकी दलील यह थी कि सन् १९१० का कानून १९ उसे यह कर अदा करनेसे बरी करता है, क्योंकि उसने अपने गिरमिटकी अवधि समाप्त होनेपर दुबारा सेवाका अनुबन्ध किया है । देखिए इंडियन ओपिनियन, १७-२-१९१२ । ३. नेटाल भारतीय कांग्रेसने न्याय-सचिवके नाम अपने १८ नवम्बर, १९११ के पत्र में प्रवासी-संरक्षक द्वारा अनेक भारतीय भाषाओं में जारी की गई सन् १९१० की गश्ती चिट्ठी (देखिए "तीन पौंडी कर ", पृष्ठ १७६, पाद-टिप्पणी २) का उल्लेख करते हुए यह दावा किया था कि दुबारा गिरमिट में बँधनेवाले भारतीय तथा दीवानी अनुबन्ध करनेवाले अन्य लोग चालू परवाना शुल्कसे बरी हैं। उसने इस करकी समाप्तिके लिए आन्दोलन करनेका विचार भी व्यक्त किया था और सलाह दी थी कि यदि सरकार चाहे तो राजस्वके इस घाटेको पूरा करनेके लिए उचित कर लगाये। (इंडियन ओपिनियन, २-१२-१९१२ ) । फरवरी २, १९११ के अपने उत्तर में गृह मन्त्रीके कार्यवाहक सचिवने दुबारा गिरमिटमें बँधनेवाले ऐसे भारतीयोंके सम्बन्धमें और जानकारी माँगी थी जिनपर यह परवाना शुल्क न देनेके कारण मुकदमे चलाये गये थे । Gandhi Heritage Portal