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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२९७

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२२१. नेटालमें भारतीयोंकी शिक्षा

नेटाल प्रान्त के शिक्षा मन्त्री अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहते हैं: "पिछले कुछ वर्षों में भारतीय स्कूलों ने बहुत तरक्की की है।" बस भारतीय बच्चों की शिक्षा के बारे में उन्हें इतना ही कहना है। जाहिर है कि वे मौजूदा हालत से सन्तुष्ट हैं; और मौजूदा हालत यह है कि यूरोपीय बच्चों की शिक्षा पर सालाना १००,००० पौंड से भी काफी ज्यादा खर्च होता है और भारतीय बच्चों की शिक्षा पर ६७६१ पौंड की अदना-सी रकम । कोई भी व्यक्ति, जिसे यह नहीं मालूम है कि नेटाल में भारतीयों की स्थिति क्या है, स्वभावत: यह पूछेगा कि भारतीयों व यूरोपीयों को दी जानेवाली शिक्षा की सुविधाओं में इतना अन्तर होने का कारण क्या है। भारतीयों की जन संख्या यूरोपीयों से अधिक है । क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं है कि वह अपने लोगों को, चाहे वे किसी भी जाति के क्यों न हों, शिक्षा प्रदान करे। वह उन हजारों भारतीयों के सम्बन्ध में क्या करना चाहती है जो यहाँ प्रान्त के कृषि-सम्बन्धी साधनों से उसे अधिक से अधिक लाभ देने की दृष्टि से लाये गये हैं ? निश्चय ही सत्तारूढ़ लोगों के कंधों पर बड़ा भारी दायित्व है । फिर हम यह भी देखते हैं कि एक यूरोपीय को शिक्षा प्रदान करने का खर्च ५ पौंड १२ शिलिंग २४ पेंस है और एक भारतीय का १ पौंड १४ शिलिंग ५ पैंस । इस प्रकार थोड़े-से भारतीय बच्चों को जो शिक्षा मिलती है, उसमें भी बड़ी कंजूसी बरती जाती है; और वह जैसी हालतों में दी जाती है, वैसी हालत यूरोपीयों के लिए कभी गवारा न की जाती। डर्बन तथा पीटरमैरित्सबर्ग के सरकारी स्कूलों में कुल ५७० भारतीय विद्यार्थी हैं, जिनमें लड़कियों की संख्या केवल २५ है । यह बहुत- कुछ इस कारण से है कि सरकार ने स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था करना अस्वीकार कर दिया है । कभी हायर ग्रेड भारतीय स्कूल में लड़कियाँ अच्छी संख्या में पढ़ने जाती थीं;परन्तु बादमें माता-पिताओं ने स्कूल से अपनी लड़कियाँ हटा लीं और अब उसमें केवल ३ लड़कियाँ जाती हैं। माता-पिताओं के इस कदम को भावुकता भी कहा जा सकता है। परन्तु बहुत-से लोगों की निगाह में भावना बड़ी चीज होती है और अधिकारियों को उनकी भावनाओं की उपेक्षा करने और उन्हें कुचलने का कोई हक नहीं है ।

परन्तु भारतीयों को शिक्षा-सम्बन्धी सुविधाएँ न देने के लिए हम शिक्षा अधीक्षक (सुपरिटेंडेंट) को दोष नहीं देना चाहते और न सरकार को ही दोष देने से कुछ लाभ है। खुद भारतीय समाज इन मामलों में लापरवाह है। आखिर हमें ज्यादातर तो वही मिलता है जिसके हम योग्य हैं । वतनी लोग तो इस समय भी भारतीयों की शिक्षा पर व्यय होनेवाली सरकारी रकम से दूनी रकम पा रहे हैं और उनकी मौजूदा कार्रवाई से लगता है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी सहायता का उचित भाग दिये जाने की माँग करना चाहते हैं । परन्तु वतनी सिर्फ सरकार पर ही निर्भर नहीं हैं । इस समय देश के विभिन्न भागों में उनकी बहुत-सी अच्छी संस्थाएँ हैं, जिनमें