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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२९९

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२२२. पत्र : ई० एफ० सी० लेनको

लॉली
मई ३१, १९१२

प्रिय श्री लेन,

मेरा खयाल है कि जनरल स्मट्सने विधेयकके दूसरे वाचनके समय जो भाषण[] दिया उससे अन्तरप्रान्तीय प्रवासके प्रश्नकी स्थिति कुछ असन्तोषजनक हो गई है। जान पड़ता है कि इस सम्बन्धमें जो आपत्ति उठाई गई है, उसे संसदमें इस समय पेश इस विधेयकके सम्बद्ध खण्डके वर्तमान स्वरूपमें संशोधन करनेके बजाय जनरल स्मट्स अमलमें नरमी बरत कर दूर करना चाहते हैं। जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, इससे सत्याग्रहियोंको सन्तोष नहीं होगा । इसलिए मैं आशा करता हूँ कि इस विधेयक में कोई ऐसा संशोधन कर दिया जायेगा, जिससे अन्य प्रान्तोंमें रहनेवाले एशियाइयोंका नेटाल तथा केपमें प्रवेश करनेका अधिकार यथावत् बना रहे ।

हृदयसे आपका,

टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६५४ ) की फोटो-नकलसे ।
 

२२३. “एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला"

'नेटाल ऐडवर्टाइज़र' में उक्त शीर्षकसे एक मामलेका विवरण प्रकाशित हुआ है। यह मामला डर्बनकी प्रथम फौजदारी अदालतमें श्री जे० वाई० गिब्सनके सामने पेश हुआ था। विवरण इस प्रकार है :

जदुबंसी नामकी एक भारतीय महिलापर यह अभियोग लगाया गया कि गिरमिटिया मजदूरिन होने के बावजूद उसने अपने कानूनी मालिकके पास लौटने से इनकार कर दिया। अभियुक्ताने अपना अपराध स्वीकार किया । मामले की परिस्थितियोंको स्पष्ट करते हुए बताया गया कि यह महिला अपने मालिकके पास जानेसे दृढ़तापूर्वक बराबर इनकार करती रही है, जिसके फल-स्वरूप उसे लगातार सजाएँ भोगते रहना पड़ा है, और अबतक वह कुल मिला-कर छः माह की सजा भोग चुकी है। यह स्टैंगरके एक संस्थान (एस्टेट) में काम करती थी, किन्तु किसी दुर्घटनामें इसका बच्चा जल गया। इसके बाद
  1. १. देखिए परिशिष्ट १७ ।