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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३०२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

जेल भेज दिया । एक महीने की कैद काटनेके बाद उसने फिर अपने मालिकके पास लौटनेसे इनकार कर दिया । जान पड़ता है, अब उसके मालिकने उसे वापस पा सकनेकी आशा बिलकुल छोड़ दी है, और इसलिए उसे जहाजसे भारत भेज देनेकी अनुमति दे दी है। वह भारत जाना भी चाहती है। उसका कहना है कि भर्ती करनेवाले एक एजेंटने भारतमें उसके साथ धोखेबाजी की थी और उसे वहाँसे उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती भेज दिया गया था ।

यदि इस महिला द्वारा बताई गई आधी कहानी भी सच हो तो वास्तवमें यह "एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला" है। गिरमिट प्रथाके समर्थकोंकी दृष्टिसे भी इसे दुर्भाग्य-पूर्ण ही माना जाना चाहिए कि ऐसे मामले लोगों के सामने आते हैं। ऐसा एक ही मामला पूरी प्रथाको बुरा सिद्ध कर देनेके लिए पर्याप्त है; क्योंकि इससे यह प्रकट होता है कि सुदूरवर्ती इलाकोंमें कैसी-कैसी भयानक बातें हो सकती हैं । हम श्री गिब्सनको धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने इस निरीह महिलाको अधिक भोगनेसे बचा लिया।

[ अंग्रेजीसे ]
इंडियन ओपिनियन, १-६-१९१२

२२४. गिरमिटिया भारतीयोंका स्वास्थ्य

तपेदिक आयोग के सामने भारतीय प्रवासी-संरक्षकने जो गवाही दी, उससे एक बार फिर इस तथ्यका स्मरण हो आता है कि कुछ अन्य मामलोंकी तरह स्वास्थ्यके मामलेमें भी वह अपने संरक्षित लोगोंको सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ है। संरक्षक एक सरकारी कर्मचारी है और प्रवासी न्यास निकाय ( इमिग्रेशन ट्रस्ट बोर्ड) से स्वतन्त्र है । इसलिए वह उसके सदस्योंके हस्तक्षेपके बिना स्वतन्त्र रूपसे काम कर सकनेकी स्थिति में है। सफाई निरीक्षक तथा चिकित्सा अधिकारी, जिनकी नियुक्ति बैरकों और उनमें रहनेवाले लोगोंके स्वास्थ्यकी हालतकी देखभालके लिए की जाती है, ऐसी स्थितिमें नहीं हैं। उन्हें न्यास निकाय नियुक्त करता है, इसलिए वे अपने इन मालिकोंके दबावमें रहते हैं। हमारा खयाल है कि इन परिस्थितियोंमें इन अधिकारियोंके लिए अपना काम कर सकना कठिन है । जब तपेदिक आयोगने कुछ बैरकोंके इर्द-गिर्दकी जमीनके बारेमें, जो जहाँ-तहाँ गँदला पानी और कूड़ा-करकट फैले होनेसे बड़ी गन्दी हालत में पड़ी थी, प्रश्न किया तो श्री पॉकिंगहॉर्नने[] बताया कि इन चीजोंकी देख-भाल करनेके लिए एक सफाई निरीक्षककी व्यवस्था है । हम इस बातको भली-भाँति समझ सकते हैं कि सफाई निरीक्षकको मालिक बराबर परेशान करनेवाली एक बला समझते हैं। उसके दोष-दर्शनका मतलब होता है खर्च में वृद्धि और लाभमें कमी । नतीजा यह है कि अक्सर ये अफसर बहुत आवश्यक सुधारोंके बारेमें भी सुझाव तक नहीं रखते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह वरंके छत्तेको छेड़ना होगा। स्वाभाविक है

  1. १. जे० ए० पॉकिंगहॉर्न; नेटालमें भारतीय प्रवासियोंके संरक्षक ।