२२७. तार : द० आ० ब्रि० भा० समितिको
[ जोहानिसबर्ग ]
जून २६, १९१२
२३१-२ स्ट्रैंड
फ्रीडडॉप के बाड़ोंके यूरोपीय मालिकोंको अन्तिम रूपसे नोटिस[१] मिले हैं कि वे तीन महीनके अन्दर एशियाई किरायेदारोंको निकाल दें । आदेशका पालन न करनेपर बाड़े जब्त कर लिए जायेंगे; इनमें से कुछ यथार्थ में भारतीयोंके हैं । फ्रीडडॉर्प के ग्यारह भारतीय व्यापारी बाड़े छिन जानेपर बरबाद हो जायेंगे ।
मो० क० गांधी
- [ अंग्रेजीसे ]
- कलोनियल आफिस रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/३५
२२८. लॉर्ड ऍम्टहिलकी समिति
हमारी विलायतकी समितिका और जोहानिसबर्ग में होनवाले सार्वजनिक कार्यका खर्च उठाने के लिए पैसा न होनेके कारण अभी कुछ दिन हुए, ट्रान्सवालमें चन्दा इकट्ठा करनेका एक काम शुरू हुआ है। इस कामकी जिम्मेदारी, सच पूछिए तो, श्री सोराबजीने अपने ऊपर ली है। उनके साथ अक्सर श्री काछलिया भी निकलते हैं। इसी प्रकार श्री दुलभभाई कल्याणजी, श्री परभुदयाल, श्री मंछा गोसाई,
- ↑ १. ये नोटिस सन् १९०७ के फ्रीडडॉर्प बाड़ा अधिनियमके खण्ड ४ के अन्तर्गत ६ जून, १९१२ को उन बाड़ा-मालिकोंपर तामिल किये गये थे जिनके बादों में एशियाई, वतनो या रंगदार लोग रहते थे । फ्रीडडॉ बाड़ा अध्यादेश, ट्रान्सवालको उत्तरदायी शासन मिलनेके पूर्वं, २८ सितम्बर, १९०६ को सरकारी गज़टमें प्रकाशित हुआ था । इस अध्यादेशके अनुसार एशियाइयों या रंगदार लोगोंको इन बादोंकी जमीन पट्टेपर या शिकमी पट्टे पर देनेकी मनाही की गई थी । वे वहाँ बने हुए मकानों में घरेलू नौकरोंकी तरह ही रह सकते थे; अन्यथा उनका वहाँ रहना भी मना था । ८ अक्तूबर, १९०६ को ब्रिटिश भारतीय संघने लॉर्ड एलगिनको इसका विरोध करते हुए एक प्रतिवेदन दिया था, जिसमें उसे शाही मंजूरी न देनेकी माँग की गई थी; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४७६-७८ । इस प्रतिवेदन और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा किये गये अन्य प्रयत्नोंके फलस्वरूप ( खण्ड ६, पृष्ठ ३६२-६३ और ३६७) एक नया विधेयक पास हुआ था, जिसमें ४ वर्षके नोटिस और भारतीयों द्वारा बनाये गये मकानोंके सम्बन्धमें मुआवजा देनेकी व्यवस्था थी; देखिए खण्ड ७, पृष्ठ १७४ ।