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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३५०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

यह मैं तुम्हें बता ही नहीं सकता। लेकिन आजकल तुम जिस वातावरणमें रहते हो वह दूषित है, इसीलिए फ्रेंच सीखनेकी सूझी। तुमने परीक्षा एक वर्ष देरसे पास की होती, लेकिन संस्कृत सीख ली होती तो कितना अच्छा होता! संस्कृतके ज्ञानसे सब भारतीय भाषाओंको जाननेका द्वार खुल जाता है। उसको तुमने अपने हाथसे बन्द कर दिया। तुमने फिरसे फ्रेंचकी चर्चा छेड़ी है, इसीलिए इतना लिख रहा हूँ। अगर तुम अब भी सोच-विचार कर एक वर्षके लिए परीक्षा देनेका विचार छोड़ दो और संस्कृत पढ़ो तथा उसमें निजी अभ्यासके लिए सातके बदले आठ रुपये भी खर्च करो तो मुझे प्रसन्नता होगी । फिर भी जैसा मनमें आये, वैसा करना। तुम जिस कक्षामें चाहो दाखिल हो जाओ। मैं तुम्हारी इच्छामें विघ्न नहीं डालना चाहता। मेरी सलाहको एक घनिष्ठ मित्रकी सलाह मात्र समझना।

मोहनदासके आशीर्वाद

[पुनश्च:]

चंची क्यों नहीं आई, यह मैं नहीं समझ सका। चंचीको जब भेजो तब तार देना जिससे उतारनेका प्रबन्ध कर सकूँ। रामीका समाचार भी चंचीने ही दिया था।[]

गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस॰ एन॰ ९५४२) की फोटो-नकल से।

 

२७१. श्री और श्रीमती पोलक

श्री और श्रीमती पोलकके भारतसे लौटनेपर डर्बनके भारतीयोंने उनका हार्दिक स्वागत किया। श्री पोलकका इस पत्रके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिए उनके कामकी[]

  1. देखिए "बली वोरा और चंचलबहन गांधी को लिखे पत्रका अंश", पृष्ठ २९२-९३।
  2. श्री पोलक ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघकी ओरसे दक्षिण आफ्रिका के भारतीय प्रश्नको वहाँकी जनताके सामने रखने की दृष्टिसे भारत भेजे गये थे और वे नवम्बर १९११ के मध्य में भारत पहुँचे थे। पहुँचनेपर जल्दी ही नेटाल भारतीय कांग्रेसने भी तार द्वारा उनसे भारत सरकार और सार्वजनिक संस्थाओंके सामने अपनी बात रखनेकी दृष्टिले प्रतिनिधित्व करनेकी प्रार्थना की। उनसे तीन पौंडी करको रद किये जानेपर विशेष बल देनेकी प्रार्थना की गई। श्री पोल्कने इस बातको छेकर व्यापार तथा उद्योग-विभागके सचिवको अनेक पत्र लिखे। सरकारके साथ उन्होंने ट्रान्सवाल कस्बा कानून संशोधन अधिनियम, १९०८, स्वर्ग-कानून तथा ट्रान्सवाल सरकार द्वारा मुस्लिम कानूनके मुताबिक हुए बहुपत्नीक विवाहोंको अमान्य करनेके विषय में भी लिखा-पढ़ी की। वे दिसम्बर, १९११ की कलकत्ता कांग्रेस तथा मुस्लिम लीगके छठे अधिवेशन में भी दक्षिण आफ्रिकी भारतीयोंकी स्थितिपर बोले। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक संस्थाओंके तत्वावधान में आयोजित सभाओं में उन्होंने उक्त प्रश्नपर प्रकाश डाला और इन सभाओं में से कई सभाओं में दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयों के प्रति किये जानेवाले व्यवहारको लेकर निन्दाके प्रस्ताव पास किये गये तथा उनमें भारत सरकार से इन शिकायतोंको दूर करने तथा गिरमिट प्रथाको बन्द करनेकी प्रार्थना की गई शेरिफकी सभा में पोलकने जो सनसनी पैदा करनेवाला भाषण दिया (देखिए पृष्ठ २९६-९७), उसके फलस्वरूप समाने वाइसरॉय को स्मरणपत्र भेजा और सभा के अध्यक्ष सर जमशेदजी जीजीभाईने पोलकके सम्मानमें एक भोज दिया तथा उनकी भारत-सेवाकी प्रशंसा की। देखिए "पोलकका कार्य", पृष्ठ १११, तथा "श्री पोलक भारतीय राष्ट्रीय महासभामें", पृष्ठ २०३।