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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३५१

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महाविभव आगा खाँ

चर्चा करनेके लिए यह शायद उपयुक्त स्थान नहीं है। परन्तु इस पत्रकी सम्पादकीय पतवारके फिर उनके हाथमें जानेसे पहले उनके सार्वजनिक कार्योपर विचार कर लेना शायद अनुपयुक्त नहीं होगा। सम्पादकीय कार्य तो, हमारे पाठक जानते ही हैं कि वे केवल प्रेमवश करते हैं।

श्री पोलक अपनी चतुराई, योग्यता और अटूट लगनके कारण भारतका लोकमत जाग्रत करनेमें इतने सफल रहे कि आज भारतकी जनता दक्षिण आफ्रिका के भारतीयोंके प्रश्नमें सबसे ज्यादा रुचि ले रही है और उनके पक्षका वहाँ सबके द्वारा जैसा समर्थन हो रहा है, वैसा किसी और बातका नहीं। माननीय श्री गोखलेने गिरमिटिया प्रश्नको हल करने में जो शानदार सफलता प्राप्त की, वह भी उनके ही सतत प्रयत्नका परिणाम थी। उन्हीके प्रयत्नसे सत्याग्रहियोंकी सहायताके लिए खोला गया कोष, जो खाली हो चला था, फिर भर गया[]; और यह उन्हींके अनथक उत्साहका फल है कि भारत सरकार हमारी शिकायतोंसे पूर्णतया परिचित हो गई है।

परन्तु, यदि श्रीमती पोलकने उमंग और उत्साहसे श्री पोलककी सहायता न की होती तो वे कुछ भी न कर पाते। इतना ही नहीं, उन्होंने इस कार्यमें स्वयं सक्रिय हिस्सा भी लिया। वे निःसंकोच भारतीय महिलाओंसे मिलती रहीं और उन्हें हमारी स्थिति से परिचित कराती रहीं। उनका विश्वास है--और वह ठीक ही है--कि कोई भी सुधार या आन्दोलन तबतक सफल नहीं हो सकता जबतक कि मानवताका शेष आधा भाग भी उसमें रुचि न ले। इसलिए उन्होंने भाषण और लेखन द्वारा अपने पतिकी सहायता करनेका कोई भी अवसर हाथसे नहीं जाने दिया। हमें यह भी ज्ञात है कि उन्होंने श्री पोलकके लिपिक तक का बहुत-सा काम करना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध नहीं समझा। समाज ऐसे मित्रों और कार्यकर्ताओंका सम्मान करे तो वह उचित ही है।

[ अंग्रेजीसे ]
इंडियन ओपिनियन, ७-९-१९१२
 

२७२. महाविभव आगा खाँ

ज्ञात हुआ है कि महाविभव आगा खाँने दक्षिण आफ्रिका आनेका निश्चय किया है। इसपर भारतीय समाज अपने-आपको प्रत्येक दृष्टिसे बधाई दे सकता है। महाविभव मुसलमानोंके एक अति प्रभावशाली सम्प्रदाय के धर्मगुरु हैं। वे भारतीय मुसलमानोंके सर्वमान्य राजनीतिक नता है और एक ऐसे सुसंस्कृत भारतीय हैं, जो भारतके हितसे सम्बद्ध प्रत्येक कार्य में सक्रिय और विचारपूर्ण भाग लेते रहते हैं। वे उदार विचारोंके राजनीतिज्ञ हैं और हिन्दुओं और मुसलमानोंको एक-दूसरेके और ज्यादा

  1. हो सकता है कि श्री पोलकने अपनी भारत यात्र के दौरान सत्याग्रह कोषके लिए सर्वसामान्य रूपसे चन्दा इकट्ठा किया हो, किन्तु यहाँ तात्पर्य शायद बम्बई में आयोजित शेरिफकी समामें रतन टाटा द्वारा २५,००० रुपये देनेकी घोषणासे है; देखिए पृष्ठ २९५।