कहा कि हम भारतीय अंध-श्रद्धालु माने जाते हैं; मुझे यकीन है कि इस मामले में मेरे अधिकांश देशवासी मेरी ही तरह अंध श्रद्धालु होंगे और मानते होंगे कि इस चिर-प्रतिक्षित वर्षाको श्री गोखले ही अपने साथ लाये हैं। (तालियाँ)। परन्तु मेरे खयालसे एक और कारण भी है, जिससे कि स्वागत-समितिके निमन्त्रणको स्वीकार करके आनेवाले कृपालु यूरोपीय मित्रों और मेरे अपने देशवासियों, दोनोंके द्वारा शुभ-कामनाके इस आपानकका स्वागत किया जाना चाहिए। श्री ओट्सने हमारे आजके मेहमान और उनके साथियों को अपनी विशाल खान देखनेके लिए आमन्त्रित किया था। उनके साथ वहाँ जानेपर मैंने जो बड़ी-बड़ी मशीनें देखीं, मैं उनकी विशालता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। समारोह में उपस्थित मेरे कुछ मित्र जानते हैं कि मैं मशीनों में विश्वास नहीं करता। मैं अपने तई तो यह मानता हूँ कि यदि किम्बलेंमें हीरे और मशीनें न होतीं तो भी किम्बलेंसे मेरा काम चल जाता। मैं लाखोंकी धनराशि और हीरोंमें विश्वास नहीं करता। परन्तु वहाँ मुझे लगा कि मैं हीरोंके सम्राटों के सामने खड़ा हूँ और इसलिए उनके सामने मेरा सिर झुक गया। उन मशीनोंको देखकर मेरे दिमाग में एक विचार जोरोंसे उठा कि यदि सभी मनुष्य इस अद्भुत और विशालकाय मशीनकी भाँति ही मिलकर काम करने लगें तो मानव-परिवार कितना सुखी हो जाये। तब सचमुच ही तलवारोंको गलाकर हलोंके फाल ढाल लिये जायेंगे और शेर और बकरी दोनों एक ही घाट पानी पीने लगेंगे। मुझे यह भी लगा कि यदि उस विशालकाय मशीनका एक पेंच भी ढीला पड़ जाये तो शायद पूरी मशीनके जोड़ खुल जायेंगे। इस बातको मनुष्योंपर घटा कर देखें तो ऐसे उदाहरण बहुधा सामने आते रहते हैं कि शोर-गुल मचानेवाला कोई एक ही व्यक्ति पूरी सभाको छिन्न-भिन्न कर देता है और परिवारका एक ही आवारा सदस्य पूरे परिवारको इज्जत धूलमें मिला देता है। दूसरी ओर, यदि मशीनके मुख्य-मुख्य पुर्जे अपना काम ठीक करते रहते हैं तो हम देखते हैं, दूसरे पुर्जों में भी पारस्परिक मेल कायम रहता है और सब अपना काम ठीक करते रहते हैं। श्री गांधीने कहा कि श्री गोखले एक पवित्र उद्देश्य लेकर आये हैं और मुझे इस बातपर गर्व है कि श्री गोखलेके निमित्तसे किम्बलें में एक ही दस्तरखानपर यूरोपीयों और भारतीयों के सबसे प्रमुख प्रतिनिधियोंके साथ-साथ बैठने-जैसी बड़ी चीज हुई। आशा है, अब आये दिन ऐसे आयोजन हुआ करेंगे। अलबत्ता, में टॉल्स्टॉयके जीवन और उनकी शिक्षाओंके एक विनम्र विद्यार्थीके नाते यह भी महसूस करता हूँ कि इस प्रकारके भोज अनावश्यक हैं और कभी-कभी इनसे बड़ी हानि होती है--चाहे वह हानि पाचन-क्रियाकी गड़बड़ी के रूपमें ही क्यों न हो। (हँसी)। परन्तु टॉल्स्टॉयका शिष्य होनेके बावजूद यदि इस प्रकारके भोज हमें करीब लाते हैं और एक-दूसरेको और अच्छी तरह समझने में हमें मदद देते हैं तो मैं इस समय तो ऐसे भोजोंकी उपयोगिता मानने को तैयार हूँ। मुझे एक श्रेष्ठ भजनकी पंक्तियाँ याद आती हैं--"जब यह कुहासा छँट जायेगा, तब
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