३०१. एक तार[१]
आर॰ पी॰ डी॰ 'कॉन्प्रिज'
[नवम्बर १९, १९१२, या उसके बाद]
धन्यवाद कार्यक्रम सुविधाजनक। गोखलेका स्वास्थ्य असन्तोषजनक। उन्हें कष्ट न दें।
मो॰ क॰ गांधी
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी मसविदे (एस॰ एन॰ ५७३६) की फोटो-नकलसे।
३०२. पत्र : गो॰ कृ॰ गोखलेको
दारेसलाम
दिसम्बर ४, १९१२
मैंने अभी-अभी सुना कि भारत जानेवाली डाक आधे घंटे के भीतर ही निकल जायेगी (अभी सुबहके ९-३० बजे हैं)। हम यहाँ दो दिन और हैं।
जोहानिसबर्गसे इस आशयका तार पाकर कि मंजूषा[२] लॉरेंको माक्विसमें मिल गई है और आपके पास भेजी जा रही है, मैंने आपको माही तार[३] भेजा था। उम्मीद है कि तार आपको मिला होगा। एक तार[४] कुमारी श्लेसिनको भी भेजा था जिसमें उनसे उसका बीमा करनेके लिए कहा गया था। अस्तु।
कृपया मेरी कमियोंपर ध्यान न दें। मैं आपका एक योग्य शिष्य बननेका इच्छुक हूँ। यह झूठी विनय नहीं है; बल्कि इसमें भारतीयोचित सच्ची उत्कटता है। पूर्वी शिष्यका जो चित्र मेरे मनमें है उसे मैं अपने में ही मूर्तिमान करना चाहता हूँ। हमारे बीच अनेक मतभेद क्यों न हों, परन्तु मेरा निश्चय है कि राजनीतिक जीवनमें आप मेरे आदर्श रहेंगे।
- ↑ श्री गोखले, गांधीजी तथा कैलेनबैकके साथ १८ नवम्बर, १९१२ को मध्य रात्रिमें जर्मन ईस्ट आफ्रिका लाइनके जहाज भार॰ पी॰ डी॰ क्रॉन्प्रिजपर सवार हुए थे। रास्तेमें गोखले और उनके साथियोंने बेरा में उतर कर २१ और २२ तारीख वहाँ बिताई, २७ जंजीबार में २५ तारीख मोजाम्बिकमें। इन स्थानों में श्री गोखलेको पुष्पमालाएँ पहनाई गई और मानपत्र दिये गये। अतः गांधीजीने यह तार १८ और २६ के बीच किसी दिन उपर्युक्त तीन स्थानोंमें से किसी एक स्थानकी स्वागत-समितिको भेजा होगा।
- ↑ कदाचित् यह वह मंजूषा है जिसमें रखकर मि॰ भा॰ संघ द्वारा भेंट किया गया अभिनन्दनपत्र और अभिलिखित स्वर्णपत्र श्री गोखठेको दिया गया था। मंजूषाके गुम होनेके विषय में देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ ३३८ और डायरी १९१२ में नवम्बर २८ की टीप।
- ↑ दोनों तार उपलब्ध नहीं हैं।
- ↑ दोनों तार उपलब्ध नहीं हैं।