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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३८९

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पत्र : जमनादास गांधीको

जानेपर दूध, घी, दही आदि लेना शुरू कर देना। चीनी अथवा नमककी तो जरूरत नहीं पड़गी। लेकिन अगर यह सब लेना भी जरूरी हुआ तो लेना और अपना स्वास्थ्य सुधारना। यदि कुछ दूसरा प्रयोग करना चाहो तो बादमें जब मैं वहाँ आऊँगा तब करना। तुम्हारा शरीर स्वस्थ नहीं रहेगा तो तुम्हारे प्रयोगपर किसीको श्रद्धा नहीं होगी और अगर [इससे] तुम्हारा चित्त ठिकाने नहीं रहेगा तो यह प्रयोग तुम्हारे किसी भी काम नहीं आयेगा।

और ये रहे तुम्हारे प्रश्नोंके उत्तर!

दही न खायें तो स्वाभाविक है कि मक्खन, छाछ आदि भी न खाना चाहिए। क्योंकि, अगर दही त्याज्य है तो मक्खन और छाछ भी तो उसीके भाग हैं। ये कम स्वादिष्ट होते हैं, इसीलिए इनमें कम दोष हैं। लेकिन यह सूक्ष्म भेद तुम्हें ध्यानमें रखने की जरूरत नहीं। तुम घी खाओ तो दूध, दही आदि भी ले सकते हो। पीछे देखा जायेगा।

नारियलका तेल खानेवाला अगर नारियल खाये तो उसमें कोई हर्ज नहीं। और नारियल ही ज्यादा अच्छा भी है। लेकिन जैसे [किसी व्यक्तिको] गेहूँ न पचे लेकिन उसका सत्व पच सकता है वैसे ही सम्भव है कि किसीको नारियल न पचे और तेल पच जाये। जिसके दाँत न हों, उसके लिए तो तेल ही ठीक है। शायद तुम्हारे बारेमें भी यही ठीक हो। तिलके बारेमें भी यही कहा जा सकता है। जिनसे पाँच तोला तेल पेटमें पहुँच जाये, इतने तिल खाना तो बहुत कठिन है। [तेल खानेसे तिलका] फुजला छूट जाता है और कुछ लोगोंके शरीरकी बनावट ऐसी होती है कि फुजला छूट जाना ही ठीक है।

केवल केला खाकर भी निर्वाह हो सकता है। केला खानेवाला व्यक्ति मेवा न खाये तो भी हर्ज नहीं है। मुझे लगता है कि फलोंकी अपेक्षा बादाम आदि अधिक पौष्टिक हैं।

तुम्हें फोड़े होनेके दो कारण हो सकते हैं। उपयुक्त खुराक न लेनेसे तुम्हारे रक्तकी शक्ति कम हो गई और फीनिक्सकी बुरी आबोहवाका आसानीसे तुमपर असर पड़ गया, या हो सकता है कि फीनिक्सका पानी ही त्वचापर ऐसा असर करता हो जैसा स्वच्छ रक्तवाले व्यक्तिकी बाह्य त्वचापर थूहरका हो जाता है।

यदि एनीमा लेते हुए पेटमें थोड़ी हवा चली जाये तो उससे कोई नुकसान नहीं होगा। कभी-कभी पेटमें दर्द हो सकता। क्योंकि इस तरह हवाका पेटमें जाना अस्वाभाविक है। ऐसा हो जाये तो टट्टीमें बैठकर काँखनेसे काफी हवा निकल जायेगी। पेटमें हवा के चले जानेसे मृत्युकी सम्भावना तो नहीं होती, लेकिन कृष्णा-जैसे नाजुक शरीरवाले व्यक्तिके लिए इसका परिणाम भयंकर हो सकता है।

पेटकी गड़बड़के लिए कुछ हद तक गीली पट्टी जरूर फायदेमन्द होती है। [ऐसा करनेसे] त्वचाके असंख्य छिद्रोंसे तेल निकलता है और उस हद तक भार हलका हो जाता है तथा उससे कभी-कभी पाखाना भी आता है।

जब रोगीको मिट्टीकी पट्टी भी न दी जा सके और वह उपवास करनेमें भी असमर्थ हो तब [इस उपायके द्वारा] उसके शरीरमें कोई गड़बड़ नहीं हो पाती और

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