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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३९०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

अगर हो भी तो कुछ हानि नहीं होती। उस समय रोगीको गरम दूध अथवा इस तरहके अन्य पेय देकर उसके कनकने हो जानेपर मिट्टी आदिका उपचार करना चाहिए। अगर शरीर इतना दुर्बल हो गया हो कि ठंडे जलका स्पर्श भी सहन न कर सके और उसे चुल्लू भर पानी भी न पिलाया जा सके तो समझो कि रोगीका अन्त निकट है। तब सन्तोष मानकर उसके मरनेकी राह देखनी चाहिए। किन्तु कभी-कभी उस हालत में भी रोगी सँभल जाता है।

कुछ-न-कुछ उपाय करते ही रहना चाहिए, ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। कई बार कुछ न करना ही रोगीके लिए अच्छा होता है। कृष्णा-जैसे रोगीको चावल अथवा किसी प्रकारकी सख्त रोटी भी नहीं देनी चाहिए। ऐसे रोगीकी आंतोंमें सूजन आ जाती है, इसलिए उसे बहुत सादा पेय ही दिया जाना चाहिए। यह उपचार आन्त्र-ज्वर आदिके लिए है। कृष्णा-जैसे रोगीको सन्तरेका रस छानकर देना चाहिए। उसमें बीज या झिल्लीका कोई अंश नहीं होना चाहिए।

यदि किसी सख्त बीमार रोगीको दस्त लगते हों तो उसके पेटपर बर्फके पानीकी पट्टी रखनी चाहिए और अगर तब भी दस्त आना बन्द न हो तो दस्त आने देना चाहिए।

जब रोगी बड़बड़ाये तब समझना चाहिए कि उसे कष्ट हो रहा है। उस हालतमें उसके माथे और पेटपर मिट्टी रखकर उसे खूब खुली हवामें रखना चाहिए। यदि वह तब भी बड़बड़ाये तो कोई हर्ज नहीं। कुछ समय बीतनेपर वह बड़बड़ाना बन्द कर देगा। अगर जीवन-शक्ति ही नष्ट हो गई हो तो ऐसा रोगी अन्तमें मर जायेगा।

छः महीने बीतनेके बाद तुम खुशीसे मनचाहा आहार लेने लगना।

बुनाईका काम सरलतासे सीख सको तो सीखना। उसपर कोई आग्रह नहीं है।

परमेश्वर और माँसे हम नहीं डरते, इसीलिए [उनको] प्यारमें "तू" कहते हैं। बापका भय रहता है, इससे उसे एकाएक "तू" नहीं कहते; दूसरे लोगोंकी बात तो छोड़ो। वे परमेश्वरकी अथवा माँकी जगह ले ही नहीं सकते।

सुग्रीवने बालिको मरवाया, वस्तुतः यह बात उचित नहीं कही जा सकती। यों उसकी थोड़ी-बहुत वकालत की जा सकती है। 'रामायण' और 'महाभारत 'में सदाचारी [मानेजानेवाले] व्यक्तियोंके सब कार्योंका बचाव हो सकता है. ऐसा कुछ नहीं है। कविने भी उन्हें पूर्ण पुरुषके रूपमें चित्रित नहीं किया है।

साइकिलके प्रति अगर तुम्हें इतना मोह हो तो उसपर बैठकर तुम अपने मोहसे छुटकारा पाओ। गाँवों आदिमें साइकिलका प्रयोग करनेसे पशुओंका भय रहता है। पशु हमारी साइकिलसे परिचित नहीं होते, इसलिए वे भड़क उठते हैं और हमपर चोट कर देते हैं। श्री कैलेनबैकको बिना किसी हिचकके पत्र लिख सकते हो। मैं तुम्हें पत्र लिखता रहूँगा।

मोहनदासके आशीर्वाद

गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी॰ डब्ल्यू॰ ५६४१) की फोटो-नकलसे।

सौजन्य: नारणदास गांधी।