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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३९१

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३०५. श्री गोखले स्वदेश पहुँचे

श्री गोखलेका सम्मान करनेके लिए और उनसे उनकी इस देशकी ऐतिहासिक यात्राका विवरण सुनने के लिए बम्बई में एक सार्वजनिक सभा हुई थी। इस सभाका कुछ समाचार[] रायटरन यहाँ पहुँचाया है। श्री गोखलेने अपने मनमें जो आशाएँ बाँधी हैं, इस समाचारसे हमें उनका परिचय मिलता है।

भारतमें कुछ भारतीय ऐसा समझते हैं कि दक्षिण आफ्रिकामें जितने भारतीय आना और बसना चाहें हम उन सबके आ सकनेकी छूट माँगते हैं। हमारे देशसे आनेवाले अखबारोंमें कभी-कभी ऐसा ही भाव प्रकट होता दिखाई पड़ता है। इसके सिवा भारतके कुछ नेता भी ऐसी माँग करते हैं। ऐसे टीकाकारोंको जवाब देते हुए श्री गोखलेने कहा कि हम इस किस्मके अधिकार नहीं माँगते और ऐसी माँग करना हमारे लिए ठीक भी नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें अपने वैध हकोंकी रक्षासे ही सन्तोष हो जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम समुचित व्यवहारकी आशा रखते हैं तो हमें यहाँकी गोरी प्रजाकी चिन्ता और डरका मूल भी समझ लेना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं कि एक हद तक यही बात हमारी [भावी] स्थितिका आधार है। मालूम होता है कि श्री गोखलेने बम्बईकी सभा में यह बात भलीभाँति समझा दी।

संघ-सरकारने श्री गोखलेको यह आशा बँधाई है कि प्रवासी कानूनका अमल अनुचित रीतिसे नहीं किया जायगा।[] हमें देखना है कि यह आशा किस हद तक फलती है। उसकी सफलता बड़ी हद तक हमारे व्यवहारपर निर्भर होगी। श्री गोखलेका निश्चित विश्वास है कि तीन पौंडका क्रूरतापूर्ण कर, जिसका बोझ मजदूर वर्गपर पड़ता है, उठा लिया जायेगा। यदि संसदकी अगली बैठकमें उसे रद करनेका विधेयक न आया तो आश्चर्य की बात होगी। किन्तु व्यापारिक परवानोंका सबसे बड़ा और जटिल सवाल तब भी बच रहेगा। इसमें शक नहीं है कि उसके लिए भारतीय समाजको बड़ा प्रयास करना पड़ेगा। श्री गोखले जहाँ-जहाँ गये, वहाँ-वहाँ यूरोपीयोंके साथ इस सवालकी काफी चर्चा हुई है, किन्तु कोई गोरा यह नहीं बता सका कि उसका सन्तोषजनक हल क्या हो सकता

 
  1. दिसम्बर १४ को आयोजित इस सभा में श्री गोखलेने दक्षिण आफ्रिकावासी भारतीयोंकी समस्याका विश्लेषण किया था। उन्होंने कहा था कि यदि दक्षिण आफ्रिका के भारतीय अपने प्रति उचित व्यवहारकी अपेक्षा करते हैं तो उन्हें यूरोपीयोंके इस भयका खयाल रखना होगा कि कहीं वह देश रंगदार लोगों से न भर जाये। उन्होंने गांधीजीके "आश्चर्यजनक व्यक्तित्व और कृतित्व" की भी बड़ी सराहना की। इंडियन ओपिनियन, २१-१२-१९१२ और परिशिष्ट २३।
  2. श्री गोखले १४ नवम्बरको प्रिटोरियामें स्मट्स, बोथा और फिशरसे मिले थे तथा १५ नवम्बर, १९१२ को ग्लैड्स्टनसे; देखिए परिशिष्ट २२।