हमारे साथके अधिकांश यात्री ग्रीक थे और वे गरीब थे। उनकी जाँचके समय मैं वहाँ हाजिर था। उनकी जाँचमें करीब डेढ़ घंटा लगा होगा। निवासस्थान, धन्धा आदिके विषय में सवाल पूछकर अधिकारी उन्हें अनुमतिपत्र दे देता था। उनमें से अधिकांश जोहानिसबर्ग जानेवाले थे और उनके पास कुछ कागज भी दिखाई पड़े। ये कागज मुख्यतः इस बातके प्रमाणमें थे कि उनके पास २० पौंडकी रकम है। मेरी बारी आई, तो साहबने मुझसे इस लेख के आरम्भमें दिये हुए सवाल किया।
मेरे बाद श्री कैलेनबैककी बारी आई। श्री कैलेनबैकसे उसने पूछा: "तुम्हारे पास कुछ कागज हैं?" श्री कैलेनबैकने इनकार किया और फिर उसे मेरा परिचय देते हुए कहा कि हम दोनों लोकमान्य श्री गोखलेको विदा करनेके लिए गये थे। मेरा खयाल है कि उस अधिकारीने कैलेनबैककी बात पूरी सुनी भी नहीं। उसने सिर्फ इतना ही कहा, "इसका केस मैं बादमें सुनूँगा। मैं इसे अनुमतिपत्र नहीं दे सकता। यह भारतीय है।" श्री कैलेनबैकने अपने दाँत भींचे। उन्हें बहुत बुरा लगा। उनका अनुमतिपत्र तो उन्हें तुरन्त मिल गया, किन्तु वह उन्हें जहरके समान मालूम हुआ। मुझे वहाँ छोड़कर वे अकेले किनारेपर जायें--यह तो कैसे हो सकता था? इस विचारसे उनका मन दुःखी हुआ। अपना अनुमतिपत्र लेते हुए उन्हें शर्मका अनुभव हुआ। उसे लेते समय क्रोधमें अधिकारीको कुछ खरी-खरी सुनानेके खयालसे मेरी और देखकर वे बोले: "ले, भुगत! तू तो एशियाई है। तेरी चमड़ी काली है। मैं यूरोपीय हूँ और गोरा हूँ। तुझे तो कैदमें ही रहना पड़ेगा।" (यहाँ "तू" शब्द स्नेह-सूचक है)। मैं हँस रहा था, किन्तु मेरे दिलमें आग जल रही थी : "मैं कैसा भारतीय हूँ? यह अधिकारी कैसा अन्यायी है? गोरे कितने बुरे हैं? हम भारतीय कितने तुच्छ हैं? लेकिन गोरोंका क्या दोष? अधिकारी क्या करें? मेरे भाइयोंने दक्षिण आफ्रिका में अपनी जो छाप डाली है, उसका फल मुझे मिलना ही चाहिए। आज इसकी सजा भोग रहा हूँ, कल उसका लाभ उठाऊँगा। दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंका भी क्या दोष? जैसे भारतके भारतीय वैसे हम? इसमें मेरा कर्त्तव्य क्या है? क्या अधिकारीपर नाराज होऊँ? नहीं। शासन तो अंधा होता है। तो क्या चप रहूँ? नहीं। जहाँ दुःख हो, वहाँ उसका प्रतिकार करनेका प्रयत्न करना ही चाहिए। क्या प्रयत्न किया जा सकता है? मुझे अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। मुझे स्वार्थी न तो रहना चाहिए, न होना चाहिए। डेकके मेरे भारतीय साथी गन्दगी में रहते थे; अपने रहन-सहनके द्वारा उनके समक्ष मुझे ठीक आदर्श पेश करना चाहिए। मुझे डेकके यात्रीकी तरह यात्रा करनी चाहिए और उनसे अनुरोध करना चाहिए कि वे अपने सम्मानका विचार करें और उसकी रक्षा करें; गन्दगी आदि दूर करें। गोरोंके उन कानूनोंका सम्मान करें जो ठीक मालूम होते हैं और समझमें आते हैं, और दृढ़ता तथा हिम्मत के साथ उन कानूनोंका विरोध करें जो अनुचित मालूम होते हैं और समझ में नहीं आते।
इस घटना के बाद मुझे समझना चाहिए कि मेरे जैसोंको तो जहाँतक बने, वहाँतक डेककी ही मुसाफिरी करनी चाहिए। ऐसा करनेपर ही मुझे डेकके यात्रियोंकी स्थितिकी सही कल्पना होगी, और उनकी कुछ मदद भी की जा सकेगी।" मैं अपने