कर्त्तव्यके विषय में इस निर्णयपर आया। ये सारे विचार मेरे मनमें एक क्षणके ही भीतर आये होंगे। विचारोंका वेग बहुत तीव्र होता है, इस बातपर जिनका ध्यान न गया हो, उन्हें ये शब्द पढ़ते-पढ़ते भी उसका अनुभव हो जायेगा। ये विचार मेरे चोट खाये हुए मनमें बहुत उलटे-सीधे क्रममें आये होंगे, [लेकिन] अन्तमें मेरा मन शान्त हो गया। मुझे याद है कि वह शान्त हो गया था और यह याद है, इसीलिए मैं मानता हूँ कि वह पहले अशान्त हो गया था।
इस तरह मैं तो अर्ध-स्वप्नावस्था में कुर्सीसे चिपटा बैठा हुआ था और श्री कैलेनबैक बेचैन थे और बेचैनीमें टहल रहे थे। वे पिंजरेमें कैद सिंह-जैसे दिखाई पड़ते थे। कुछ भारतीय भाई जो हमें लेनेके लिए आये थे, किनारेपर खड़े थे। श्री कैलेनबैकने उन्हें मेरे नजर-कैद होनेकी बात कही। उन लोगोंने कहा, "हमने तो श्री गांधीको उतारनेका प्रबन्ध कलसे कर रखा है। हम फिर आदमी भेजते हैं, वह अभी अनुमतिपत्र लेकर आ जायेगा।" यह खबर श्री कैलेनबैक मुझे दे गये। किन्तु उन्हें धीरज नहीं था। वे फिर अधिकारीके पास गये। उसने फिर वही जवाब दिया: "मुझसे अभी कुछ नहीं हो सकता।" जब बाकी सब लोगोंका काम पूरा हो गया, तो अधिकारी उठा और चलने लगा। मुझे कहता गया कि मेरे सम्बन्धमें निर्णय करनेमें अभी समय लगेगा। अधिकारीके जानेके थोड़ी ही देर बाद डेलागोआ बेके भारतीयों द्वारा किया गया यत्न सफल हुआ। उनका आदमी अनुमतिपत्र लेकर आया। वह उस अधिकारीके मुंशीको दिखाया गया। मुंशीने उसे देखकर मुझे अनुमतिपत्र दिया और मैं वहाँसे मुक्त हुआ। श्री कैलेनबैक और मैं किनारेपर पहुँचे, तथा डेलागोआबेके भारतीयोंकी सेवा और सत्कारका रस लेकर उसी दिन जोहानिसबर्ग जानेवाली गाड़ी में बैठे।
ऊपरकी इस घटनासे मैंने तो बहुत सीखा। 'इंडियन ओपिनियन'के पाठकोंको इसका कुछ खयाल आये और वे भी इससे कुछ सीखें, ऐसा सोचकर मैंने यहाँ उसका वर्णन किया है। क्या ऐसी आपत्ति केवल मेरे ऊपर ही आई है जो मैं उसका पुराण 'इंडियन ओपिनियन'के पाठकोंको सुनाकर उन्हें थकाना चाहता हूँ? मेरी मान्यता है कि ऐसा सवाल किसी भी पाठकके मनमें नहीं उठेगा। मैं जानता हूं कि डेला- गोआ-बे और दूसरे बन्दरगाहोंपर दूसरे भारतीय यात्रियोंको मेरी अपेक्षा हजार गुना अधिक दुःख उठाना पड़ा है। और इसीलिए मेरा मन ज्यादा जलता है और इसीलिए मैं अपनी कहानी लिख रहा हूँ। मैं तो शिक्षित माना जाता हूँ। मुझे इस बातका ज्ञान है कि कब क्या करना चाहिए। मुझे बहुतेरे गोरे पहचानते हैं। मेरी गिनती "बड़े" लोगोंमें होती है। मुझे मदद करनेवाले भी बहुत लोग हैं। फिर भी यदि मुझे इतना कष्ट उठाना पड़ा तो दूसरे भारतीयोंका, जो शिक्षित नहीं माने जाते और अपनी रक्षा करने में अशक्त हैं, क्या हाल होता होगा?
मैं चाहता हूं कि जितना उत्साह मेरे मनमें है, मेरी स्थिति में पड़नेवाले किसी और भारतीयके मनमें भी उतना ही उत्साह उत्पन्न हो। [इन सारी मुसीबतोंसे] हमारी मुक्तिकी पहली सीढ़ी यह है कि हमें अपनी स्थितिकी सही पहचान होनी चाहिए। मेरी इस डेककी यात्रामें एक भारतीय भाईने हमारी स्थितिकी चर्चा करते