'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम ४१९ आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेन उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं । (३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं । श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है। [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, ४-१-१९१३ ३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय- पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/४५७
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