३५६. पत्र: हरिलाल गांधीको
फाल्गुन सुदी ६ [मार्च १४, १९१३][१]
तुम्हारा पत्र बहुत महीने बाद मिला है। तुम पत्र न लिखनेपर हर पत्रमें पश्चात्ताप और खेद प्रकट करते हो। इस पश्चात्तापकी कोई कीमत न तुम्हारे लिए बची है और न मेरे लिए। किसीसे बेबसीकी हालतमें कोई काम न हुआ हो, उसके लिए वह पश्चात्ताप करे और फिर वैसा न करनेके लिए खूब सावधान रहे तभी पश्चात्तापका कोई फल निकलता है। तुम्हारा पश्चात्ताप तो केवल औपचारिकताके अन्तर्गत आता है। क्या बच्चे माँ-बापसे औपचारिकता बरतते हैं?
तुम्हारी परीक्षाके [परिणामके] सम्बन्धमें जैसे ही मुझे दूसरे जरियेसे खबर मिली वैसे ही मैंने तुम्हें पत्र[२] लिख दिया था। किन्तु जिस डायरीमें तुम्हारा पता था वह कहीं इधर-उधर रख दी गई थी, इसलिए पत्र उस समय डाकमें नहीं डाला जा सका। अभी-अभी छुड़वाया है। इसलिए मेरा पहला पत्र और यह पत्र लगभग साथ-साथ ही मिलेंगे।
तुम्हारे पत्रकी राह एक मैं ही आतुरतासे नहीं देखता, बा पूछती रहती है और कुमारी श्लेसिन आदि भी पूछती रहती हैं।
तुम्हारा चित्त वहाँ भी स्वस्थ नहीं हुआ है। तुम क्या चाहते हो, यह मैं नहीं समझा। तुम चंचीको साथ लेकर अहमदाबादमें रहना चाहते हो, यही एक बात मैं समझ सका हूँ। इस विषय में शायद तुमने डॉक्टरको[३] भी लिखा है। तुम्हें जैसे सुविधा हो वैसे रहना।
तुम्हारे पत्रके दूसरे भागके सम्बन्धमें इतना ही लिखना चाहता हूँ : "जैसे अच्छा लगे वैसे रहो; [किन्तु] जैसे भी हो हरिको प्राप्त, करो।" मैं बहस नहीं करूँगा। हमारे मार्ग भले ही अलग-अलग हों, किन्तु यदि हमारा गन्तव्य एक ही हो तो हम वहाँ मिलेंगे। हम विरोधी मार्गोंपर भी चले तो उससे क्या होता है? मुझे यह मिथ्याभिमान नहीं है कि मैं सर्वथा सच्चा हूँ और दूसरे झूठे हैं। इस एक बातको मैंने जरूर पकड़ रखा है कि मुझे अपना कर्त्तव्य जैसा सूझे वैसा ही करना चाहिए। किन्तु, मैं जानता हूँ कि तुम्हें इस प्रकार स्वतन्त्र मान लेनेसे भी [तुम्हे
- ↑ जनवरी २६, १९१३ को हरिलाल गांधीको लिखे पत्रमें गांधीजीने उनके परीक्षा-फलकी चर्चा की है और उनसे प्रश्न-पत्र भेजनेको कहा है। यहाँ वे पुनः प्रश्न-पत्रोंकी माँग करते है और कहते हैं कि एक साथ दो पत्र भेजे जा रहे हैं। अतः यह पत्र २६ जनवरीवाले पत्रके कुछ ही दिन बाद लिखा गया होगा।
- ↑ देखिए "पत्र : हरिलाल गांधीको", पृष्ठ ४४५-४६।
- ↑ डॉ॰ प्राणजीवन मेहता।