यही लगता होगा कि हम बराबर नहीं हैं। तुम मेरे विचारोंसे उलटा कोई रास्ता लेना चाहो तो भी तुम्हें पैसेके लिए मेरे अधीन होकर रहना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ, यदि सम्भव हो तो तुम्हें इस स्थितिसे भी मुक्त कर दूं और तब तुमसे बराबरीका होकर वाद-विवाद करूँ। परन्तु यह कैसे सम्भव हो? मैंने अपने कर्त्तव्य ज्ञानके अनुसार कमाईके साधन त्यागकर भूल की हो तो मुझे पछताना पड़ेगा। किन्तु ऐसा करते हुए मैंने बच्चोंका विचार नहीं किया, क्या इतने अंशमें यह अन्याय न माना जायेगा? इसका उत्तर मैं "ना" में देता हूँ। अपनी बुद्धिके अनुसार मैंने उनका भी विचार किया। मेरा यह विचार ठीक था या नहीं, यह तो मुझे और तुम्हें समय ही बतायेगा।
मैं देखता हूँ कि इंग्लैंड जानेका ख्याल तुम अब भी करते रहते हो। इसे दबाना। अभी तुम्हारा वक्त नहीं आया।
तुमने अपनी परीक्षाके पर्चें रखे हों तो मुझे भेजना।
मणिलाल खूब पढ़ रहा है। उसका चित्त पढ़नेमें लगा है। मैं उसे डेढ़ घंटे प्रतिदिन देता हूँ। लिखना कि तुमने कौन-कौन-सी पुस्तकें पढ़ी हैं। मेरे प्रश्नका आशय है—परीक्षाके निमित्त। अपने अंग्रेजी लेखका नमूना भेजना।
बापूके आशीर्वाद
रामदास और देवदास भी ठीक पढ़ रहे हैं; किन्तु अभी उनका चित्त लगा नहीं है। वा की तबीयत ठीक है। आनन्दलालने अभेचन्दका व्यापार सँभालनेके लिए फीनिक्ससे मुक्ति ले ली है।
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें प्रति मूल गुजराती प्रति (एस॰ एन॰ ९५३९) की फोटो-नकलसे।
३५७. पत्र : जमनादास गांधीको
फाल्गुन सुदी ६ [मार्च १४, १९१३][१]
तुम्हारे देशसे भेजे पत्र अब मिले हैं। उन्हें [सबने] बहुत दिलचस्पीसे पढ़ा। मुझे तुम्हारी मनाहीका ध्यान है। परन्तु इन पत्रोंमें तुमने छगनलाल और मगनलालको पढ़वा देनेकी अनुमति दी है। मैने उन्हें मणिलालको भी दिखा दिया है; इसमें मुझे उसका हित दिखाई दिया। तुम्हारे पत्र इतने अच्छे लगे कि अब और किसीको नहीं दिखाऊँगा। इसके अलावा जिनमें केवल तुम्हारे आन्तरिक उद्गार है उन्हें मैं अकेला ही पड़ेगा और फिर फाड़ दूंगा।
- ↑ पत्रसे स्पष्ट है कि यह जमनादास गांधीके १४ दिसम्बर, १९१२ को दक्षिण आफ्रिकासे भारतके लिए रवाना होनेके बाद ही लिखा गया होगा; और इस तिथिके बाद पड़नेवाली फाल्गुन सुदी ६ को १९१३ के मार्च महोनेकी १४ तारीख पड़ी थी।