सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५२६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४८८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उचित है । परन्तु यह याद रखना चाहिए कि जो लोग ऐसा प्रमाण न लाये हों, उनके हक इससे मारे नहीं जाते । प्रायः गरीब लोगोंको जो प्रमाण दक्षिण आफ्रिकामें मिल सकते हैं, वे देशमें नहीं मिल सकते ।


  स्त्रियोंके सम्बन्धमें भी ऐसे ही प्रमाणपत्रोंकी आवश्यकताकी बात सुनी जाती है । हमारी तो निश्चित सलाह यह है कि स्त्रियोंके अँगूठोंके निशान हर्गिज न दिये जायें। सरकारको स्त्रियोंकी शिनाख्त इतनी सख्ती से करानेका कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि इसका कोई कारण नहीं । भारतीय अनधिकारिणी स्त्रियोंको लाये हों, ऐसे उदाहरण देखने में नहीं आये हैं । इसका अर्थ यह है कि हमें अभी स्त्रियोंके सम्बन्धमें संघर्ष

करना ही है । हमारी मान्यता यही है कि स्त्रियोंके सम्बन्धमें विवाह के प्रमाणपत्र होना पर्याप्त है; और हम जानते हैं कि जिन स्त्रियोंके पास ऐसे प्रमाणपत्र है उनके अधिकार कानूनके अन्तर्गत सिद्ध किये जा सकते हैं ।


  उक्त जानकारी ट्रान्सवालके सम्बन्धमें है । सवाल भी उसीके सम्बन्धमें उठाया गया है । परन्तु सामान्यतः नेटालके सम्बन्धमें भी यही बात लागू होती है। हम जानते हैं कि नेटालमें ज्यादा सख्ती है। नेटालके अधिकारियोंको अधिक सत्ता प्राप्त है । परन्तु जिसके पासऊपर बताया गया प्रमाण हो, उसके लिए वह पर्याप्त होना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह भी याद रखना चाहिए कि हम नेटालमें इस सख्तीके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं । यदि भारतीय अपने स्वार्थ के कारण नेटालके अधिकारीकी आज्ञाको

मानेंगे तो उस हद तक ऐसी सत्ता मजबूत होगी और संघर्षको धक्का पहुँचेगा। नियम ही यह है कि जहाँ गुलाम नहीं, वहाँ मालिक भी नहीं । जहाँ लोग गुलामी करनेके लिए तैयार हो जाते हैं, वहीं दूसरे व्यक्ति मालिक बननेके लिए खड़े हो जाते हैं ।


  दक्षिण आफ्रिका में हमारी हालत अपनी शक्ति लगानेसे तत्काल सुधर सकती है । परन्तु यदि हम कमजोरी दिखायेंगे तो हम बिलकुल गिर जायेंगे। दूसरे उपनिवेशोंमें ऐसा नहीं है, क्योंकि दूसरे उपनिवेशों में स्थिति मध्यम है। इसलिए लोग यह अनुभव नहीं करते कि उनके पाँवोंमें बेड़ियाँ पड़ी हैं । यहाँ तो सभी भारतीयोंको अपने तई बेड़ियों में जकड़े हुए होने का अहसास है ।

[ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, १५ -३ - १९१३