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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५२७

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३६२. आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-११]

[खुराक--चालू]

कितनी वस्तुएँ एकदम त्याग देने लायक हैं, यह हम देख चुके हैं। अब यह बतलाना रह जाता है कि दूसरे भी कुछ पदार्थ अन्य कारणोंसे त्याग देने या कम मात्रामें सेवन करने योग्य हैं। किन्तु इसपर विचार करना मुल्तवी रखकर फिलहाल हम इस बातपर विचार करें कि हमारी खुराक क्या हो।


खुराककी बाबत हम दुनियाको मोटे तौरपर तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं :एक हिस्सा तो ऐसे मनुष्योंका है जो स्वेच्छासे अथवा अन्य सुविधा ही नहीं है,इसलिए वनस्पतिसे उत्पन्न पदार्थोंपर अपना निर्वाह करते हैं। सर्वाधिक संख्या ऐसे ही लोगोंकी है। इसमें हिन्दुस्तानका बहुत बड़ा भाग और यूरोप तथा चीन-जापानका एक बड़ा हिस्सा आ जाता है। इन लोगों में से थोड़े तो धर्मके कारण ही वनस्पति- जन्य पदार्थों का सेवन करते हैं, पर बहुतेरे ऐसे हैं जो मांसादि न मिलनेके कारण उसके बिना काम चलाते हैं और मौका पानेपर मांसादि रुचिपूर्वक खाते हैं । इटली,आयरलैंड और स्कॉटलैंडके बहुत-से लोग तथा रूसके गरीब लोग और चीनी तथा जापानी आदि इस श्रेणीमें आते हैं। इटलीका मुख्य खाद्य मकरोनी, आयरलैंडका आलू,स्कॉटलैंडका मटर और चीन तथा जापानका चावल माना जाता है। दूसरे हिस्से में वे लोग आते हैं जो वनस्पति के साथ ही मांस-मछली आदि [दिनमें] एक या एकाधिक बार खाते हैं। इसमें इंग्लैंडका बहुत बड़ा भाग, भारतके मातवर मुसलमान और जिन्हें धर्मकी बाधा नहीं है, ऐसे हिन्दू तथा धनाढ्य चीनी और जापानी आदि आ जाते हैं। यह विभाग भी बहुत बड़ा है किन्तु पहले भागसे बहुत छोटा है। तीसरेमें अत्यन्त ठंडे प्रदेशों में रहनेवाली कुछेक जंगली मानी जानेवाली जातियाँ और कुछ सीदी भी हैं, जो निरे मांसाहारपर ही निर्वाह करते हैं। मानवताका यह अंश बहुत ही छोटा है और यह भी ज्यों-ज्यों यूरोपीय भ्रमणार्थियोंके सम्पर्क में आता जा रहा है त्यों-त्यों अपने आहार में वनस्पतिका समावेश करता जा रहा है। इस वस्तुस्थितिके आधारपर हम केवल इतना ही अनुमान कर सकते हैं कि मनुष्य जीवित तो इन तीनों खाद्य प्रणालियोंके सहारे रह सकता है; किन्तु हमें देखना यह है कि इनमें सर्वोपरि आरोग्यवर्धक आहार कौन-सा है।

शरीरकी रचनाको देखते हुए यह प्रतीत होता है कि प्रकृतिने मनुष्यको वनस्पतिका आहार करनेवाला बनाया है। दूसरे प्राणियोंके साथ हमारी तुलना करते हुए यह देखने में आया है कि हमारी [शरीर]-रचना अधिकांशतः फलाहारी जानवरोंके साथ मिलती है। उदाहरणके लिए बन्दरको ले लें। उसकी खुराक हरे और सूखे फल हैं। उसके दाँत और उसका पेट हमसे मिलते-जुलते हैं। [प्राणियोंको] फाड़कर खा जानेवाले जानवर सिंह, व्याघ्र आदिके दाँतों और पेटकी रचना हमसे भिन्न प्रकारकी