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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५२८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

है। उनके-जैसे पंजे हमारे नहीं हैं। जो पशु मांसाहारी नहीं हैं, जैसे कि बैल इत्यादि, उनसे भी हमारी कुछ समानता है, किन्तु घासके एक बड़े गठ्ठेको हजम कर जानेके लिए उनकी जैसी और उनकी जितनी अँतड़ियाँ आदि हमारे नहीं हैं। इसके आधार-पर बहुतसे शोधकर्ता यह कहते हैं कि मनुष्य न मांसाहारी प्राणी है और न वह चाहे जैसी वनस्पतिका आहार करनेके लिए ही बना है। वनस्पतिमें भी उसका मुख्य आहार तो फल आदि ही होने चाहिए।

रसायन-शास्त्रियोंने प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर दिखाया है कि मनुष्यके निर्वाहके लिए आवश्यक सभी तत्व फलोंके द्वारा उसे मिल सकते हैं। केला, नारंगी, खजूर, अंजीर, सेब, अनानास, बादाम, अखरोट, मूँगफली, नारियल आदिमें स्वास्थ्यको बनाये रखनेवाले तथा शक्ति प्रदान करनेवाले सारे तत्व विद्यमान हैं। ये शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि मनुष्यको पका कर भोजन करनेकी भी जरूरत नहीं है। दूसरे प्राणी केवल सूर्यके तापमें ही पकी हुई वस्तुओं पर निर्भर रह लेते हैं; यह मनुष्यके लिए भी सम्भव होना चाहिए। उनका तो यहाँ तक कहना है कि पकाये जानेके कारण खाने योग्य वनस्पतियोंका सत्व और पोषक तत्व नष्ट हो जाता है। वनस्पतियोंका एक विशेष गुण स्फूर्ति प्रदान करना है; यह आँचपर पकानेसे अंशतः नष्ट हो ही जाता है। ये ऐसा भी कहते हैं कि जिस वनस्पतिको हम पकाये बिना नहीं खा सकते, वह हमारा आहार ही नहीं हो सकती।

इतना तो निश्चित है कि यदि उपर्युक्त कथन ठीक हो तो हमारे घरोंमें--रसोई और भोजनादिमें जो समय जाता है, उससे बहुत कम समय में यह काम निबटाया जा सकता है। हमारी स्त्रियोंका बहुतेरा समय और घरमें रसोई आदिमें फँसा हुआ स्थान बच सकता है और इस सबके परिणामस्वरूप हम अनेक प्रकारसे स्वतन्त्र हो सकते हैं तथा बचे हुए समय और पैसेका दूसरा अच्छा उपयोग कर सकते हैं।

किन्तु सब लोग रसोई बनाना छोड़ दें, अपनी स्त्रियोंको रसोईरूपी कैदखानेसे मुक्त करें, स्त्रियाँ स्वयं ही उस कैदसे मुक्त होना चाहें--यह सब स्वप्न सा ही प्रतीत होता है; और कुछ लोग ऐसा भी कहेंगे कि जो हो नहीं सकता है, उसकी चर्चा ही किस लिए। सभी लोग ऐसा कर सकेंगे या नहीं, हम इस बातका विचार नहीं कर रहे हैं। अच्छा क्या है, इतना भर विचार हम यहाँ कर रहे हैं। यदि हम सर्वोत्तम आरोग्य की बातको समझ पायें तो सामान्य आरोग्य तो प्राप्त कर ही सकते हैं। सर्वोत्तम आहार कौन-सा है, इतना जान लें तो सामान्य रूपसे हमें क्या खाना चाहिए यह भी हम जान सकेंगे।

यूरोपमें भी इस विषयपर अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। फलाहारके प्रयोग करनेवाले यूरोपीय भी देखनेमें आते हैं। कितने ही ऐसे लोगोंने अपने अनुभव प्रकाशित किये हैं। पर ये सब लोग किसी धार्मिक दृष्टिसे नहीं, केवल स्वास्थ्यकी दृष्टिसे ही फलाहारी बने हैं। जस्ट नामक एक जर्मन हैं। उन्होंने फलाहारपर एक सुन्दर ग्रंथ[१]

 
  1. ↑ रिटर्न टु नेचर