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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५३१

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हिन्दू और मुसलमान सावधान हो जायें

हमें यह सोचनेके लिए बाध्य होना पड़ता है कि हमें अपने ही साधनोंपर निर्भर रहना पड़ेगा।

[अंग्रेजीसे]
इंडियन ओपिनियन, २२-३-१९१३
 

३६४. हिन्दू और मुसलमान सावधान हो जायें

सारा सवाल यह था कि क्या मुस्लिम प्रथाके अनसार विवाहित पत्नी प्रवासी अधिनियम के अर्थमें पत्नी है। न्यायाधीशने निर्णय दिया है कि ऐसी अर्जी निश्चित रूपले अस्वीकृत कर दी जानी चाहिए, क्योंकि यह विवाह प्रवासी कानूनकी शर्तोको पूरा नहीं करता।

'केप आर्गस' ने इसी आशयकी रिपोर्ट दी है। दक्षिण अफ्रिकाके भारतीयोंको इससे ज्यादा स्पष्ट और महत्वपूर्ण फैसलेसे शायद ही कभी वास्ता पड़े। अभीतक विवाहके सवालपर असर डालनेवाले जितने भी फैसले हुए, वे सब न्यूनाधिक दुर्बोध ही थे--उनका आशय अदृष्ट नहीं होता था। इसी बार यह सवाल साफ तौरपर सीधे-सीधे पेश किया गया था। यह मुकदमा कसौटीके रूपमें किया गया था और इसमें फैसला हम भारतीयोंके विरुद्ध दिया गया है।[] यह फैसला किसी एक व्यक्तिके विरुद्ध नहीं है। और इसमें भी सन्देह नहीं कि न्यायाधीश और कुछ नहीं कर सकता था। प्रवासी अधिकारीको भी दोष नहीं दिया जा सकता। उसे तो अधिनियमपर अमल करना था और उसने उसपर अमल किया। इस फैसले का मतलब है कि हिन्दुओं और मुसलमानोंकी सभी पत्नियाँ दक्षिण आफ्रिकामें गैर-कानूनी तौरपर रह रही हैं; और इसलिए वे सरकारकी दयापर आश्रित हैं। वे इस देशमें केवल सरकारकी कृपासे रह सकती हैं। और अगर भविष्य में भारतीय पत्नियाँ--चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान अथवा पारसी--निकाल बाहर की जायें तो खुद हमारे सिवा और किसीको उसके लिए दोष नहीं दिया जायेगा। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे हमारा आत्मसम्मान हमें सहन नहीं करने देता। हम आशा करते हैं कि हर एक अंजुमन, हरएक संघ और प्रत्येक धर्मसभा सरकारके पास सम्मानपूर्ण आवेदन भेजेगी कि नये प्रवासी विधेयकमें इस प्रकार परिवर्तन किये जाने चाहिए कि प्रतिष्ठित भारतीय धर्मो के अनुसार किये गये विवाह कानून सम्मत माने जायें। यह प्रार्थना तुरन्त स्वीकार की जानी चाहिए--सो न केवल इसलिए कि हम ब्रिटिश साम्राज्यके अंग हैं, वरन् इसलिए भी कि यह अन्तर्राष्ट्रीय सौजन्यके मान्य नियमों के अनुसार होगा।

वास्तवमें यह सत्याग्रहियोंके सामने एक गम्भीर प्रश्न प्रस्तुत करता है। अर्थात् क्या उन्हें अपनी मांगोंमें इस अचिन्तित किन्तु असह्नीय कष्टके निराकरणकी बात भी शामिल नहीं कर लेनी चाहिए? जो भी हो, यह एक ऐसा सवाल है जो भारतीयोंसे उनके सर्वस्वकी--उनके व्यापार, उनके धन, उनके आराम, सबकी--कुर्बानी

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