माँगता है। उनके या उनके भाइयोंके विवाहोंको अवैध करार दिया जाये, इस कीमतपर तो अपना यह सर्वस्व बचाना उनके लिए काफी मँहगा सौदा करने जैसा होगा ।उन्हें किसी भी बातकी परवाह किये बिना शीघ्र ही इस दिशा में उत्साहपूर्वक क्रिया-शील हो जाना चाहिए।
- [अंग्रेजीसे]
- इंडियन ओपिनियन, २२-३-१९१३
३६५. भारतीय धर्मोपर हमला
'केप टाइम्स' में स्त्रियोंके सम्बन्धमें एक फैसला अभी छपा है। हमने ऐसा महत्वपूर्ण और गम्भीर फैसला अबतक कभी नहीं पढ़ा या देखा। बाई मरियम नाम-की एक स्त्री है। वह मुस्लिम शरीयतके मुताबिक ब्याही गई है। उसका पति उसे देशसे लेकर आया। प्रवासी अधिकारीने उसे प्रवेश करनेसे रोक दिया। उसने कारण यह बताया कि उसका ब्याह कानूनके मुताबिक हुआ नहीं माना जा सकता। यह मुकदमा परीक्षणात्मक मुकदमा माना गया था। सवाल एक ही था। ईसाई धर्मसे भिन्न इस्लाम या किसी अन्य धर्मके अनुसार किया गया विवाह कानूनसम्मत माना जा सकता है या नहीं? जजने फैसला दिया कि ऐसा विवाह कानूनसम्मत नहीं माना जा सकता। और इसलिए इस स्त्रीको केपमें दाखिल होनेका हक नहीं है। इस स्त्रीको वापस जानेकी आज्ञा दी गई है। इस फैसलेका अर्थ यह है कि दक्षिण आफ्रिकामें जितनी हिन्दू या मुसलमान पत्नियाँ हैं उन सबका इस देशमें रहनेका हक आज से रद हो गया है। इसका अर्थ यह है कि जो हिन्दू, मुसलमान या पारसी स्त्रियाँ इस देशमें रहती हैं वे सिर्फ सरकारकी मेहरबानीसे। यह बहुत साफ है कि अब से सरकार पत्नियोंको न आने देगी अथवा आने देगी तो वह उसकी बड़ी मेहरबानी ही मानी जायेगी। हम इससे अधिक हीन अवस्थाकी कल्पना नहीं कर सकते।
इसका इलाज हमारे ही हाथमें है। प्रयेत्क अंजुमन, धर्म-सभा या अन्य संघ विनम्रतापूर्वक सरकारसे इस कानून में संशोधन करने और भारतीय धर्मोके अनुसार किये गये विवाहोंके कानूनसम्मत माने जानेकी माँग करे। जो समाज अपनी स्त्रियोंकी और जो व्यक्ति अपनी पत्नीकी प्रतिष्ठाकी रक्षा नहीं कर सकता उसकी अवस्था पशुसे भी गई-बीती मानी जाती है। हम जानते हैं कि स्त्रियोंकी प्रतिष्ठाकी खातिर बहुत-सी लड़ाइयाँ हुई हैं और हमारा भी स्त्रियोंकी प्रतिष्ठाको रक्षामें अपना सर्वस्व खो देना ज्यादा नहीं माना जायेगा।
इस मामलेमें ऊपरकी अदालत में अपील करनेकी सलाह हम नहीं दे सकते। ऊपरकी अदालत क्या कर सकती है? हमें यह मामला ऐसा नहीं लगता कि अदालत एक बार फिर हमारे विरुद्ध फैसला दे, तभी हम सरकारके पास जायें।
यदि हम इस समय अपनी धन-दौलत, माल-मता और घर-द्वार, सबको दाँवपर लगाकर लड़ें तो वह भी कोई बड़ी बात न होगी। इन सबको हम अपने सुखके लिए संचित करते हैं। यदि प्रतिष्ठा ही चली गई तो सुख कहाँ और सुखके लिए संचित धनका उपयोग न करें तो हमारे जैसा दरिद्र और कौन होगा?