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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५३५

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३६९. फ्रीडडॉर्पका मुकदमा

इस मुकदमे में श्री बकलने फैसला एक चीनीके पक्षमें दिया है, और खर्च भी दिलाया है।[] फैसलेमें श्री बकलने लिखा है कि यह नहीं कहा जा सकता कि [सम्बन्धित] चीनी फीडडॉर्प में रहता है; वह तो एक गोरेका नौकर है। व्यापार गोरेका है। गोरा अपनी दुकानपर आता है। इसलिए वहाँ निवास तो गोरेका ही कहा जायेगा। यदि "निवास" शब्दका अर्थ इससे विपरीत किया जाये तो किसीके घरमें पाँच मिनट कुर्सी पर बैठनेवाला रंगदार आदमी भी वहाँका निवासी माना जायेगा। यह माननेका कोई कारण नहीं है कि कानून बनानेवालोंके मनमें ऐसा अर्थ रहा होगा। यदि चीनी फीडडॉप में सोता या खाता-पीता या व्यापार करता होता तो उसपर यह अभियोग लग सकता था। फ्रीडडॉपके विनियमोंमें रंगदार लोगोंको व्यापार में नौकर रखनेकी मना ही नहीं है। इस फैसले से इतना ही निष्कर्ष निकलता है कि फीडडॉप में व्यापार करनेवाला गोरा चाहे जितने रंगदार लोगोंको नौकर रखकर व्यापार चला सकता है, परन्तु कोई रंगदार आदमी फीडडॉप में घर बनाकर नहीं रह सकता।

[गुजरातीसे]
इंडियन ओपिनियन,२२-३-१९१३
 

३७०. आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१२]

[ खुराक-चालू ]

फलाहारके बाद दूसरे दर्जेका आहार वनस्पतियाँ हैं। इनके अन्तर्गत सब प्रकारकी हरी सब्जियाँ, धान्य, दाल और दूध आदिका समावेश होता है। जिस प्रकार फलाहारके द्वारा मनुष्यको आवश्यक आहारतत्त्व प्राप्त हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार वनस्पति से भी। तो भी दोनों का परिणाम एक-सा नहीं है। हमें जो तत्त्व आहारके द्वारा प्राप्त होते हैं, उनमें अनेक तो हवामें भी हैं, पर हम उन्हें हवासे प्राप्त करके आहार के पदार्थोके बिना अपना निर्वाह नहीं कर सकते। वैसे वनस्पति-मात्र पकाई जाने पर अपने असली तत्वको खो देती है और एक हद तक निस्सत्व बन जाती है। पर

 
  1. फ्रीडडॉर्प नगरपालिकाने बाड़ा नं॰ ४९५ से आह काई नामक एक चीनीको हटा देनेकी दृष्टिसे इस बिनापर मुकदमा दायर किया था कि वह एशियाई है और अपने गोरे मालिकका मुस्तकिल नौकर न होकर थोड़े समय के लिए रखा गया नौकर है। निर्णय आह काईके पक्षमें हुआ; इंडियन ओपिनियन,२२-३-१९१३।
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