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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५३९

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३७२. विवाहका सवाल[]

भारतीयोंमें गैर-ईसाई विवाहोंकी वैधतापर सर्वोच्च न्यायालयकी केप प्रान्तीय शाखाने जो महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, उसपर पिछले सप्ताह हम कुछ विस्तारसे प्रकाश डाल चुके हैं। इस सप्ताह हम नेटाल प्रान्तीय शाखाके "मास्टर" की कार्रवाईके बारेमें मूल्यवान जानकारी प्रकाशित कर रहे हैं। उत्तराधिकार-करका निश्चय करनेके लिए इस अधिकारीने एक मुसलमानी विवाहकी वैधतापर एतराज किया है।[] इस समय हमपर [और दूसरोंपर] लगनेवाले करके अन्तरकी तफसीलमें जाने- की आवश्यकता नहीं। पर जहाँतक हमारा सम्बन्ध है, "मास्टर" ने जो जबरदस्त प्रश्न उठाया है, वह है भारतके महान धर्मोके अनुसार किये गये विवाहोंकी वैधताका प्रश्न। यहाँ हम यह कह दें कि यह सर्वथा अप्रत्याशित विपदा--इसे "विपदा" ही कहना होगा--हमारे ऊपर किसी नये कानूनके कारण नहीं, बल्कि एक पुराने कानूनकी नई व्याख्याके कारण आई है। भारतीय दक्षिण आफ्रिकामें जबसे बसे हैं तबसे भारतीय धर्मोकी पद्धतिसे किये गये विवाह मान्य किये जाते रहे हैं। ऐसे विवाहोंसे उत्पन्न सन्ततिको अपने मृत माता-पिताओंके कानूनी वारिसके रूपमें प्रचुर सम्पत्ति विरासत मिली है। वर्तमान असहनीय परिस्थिति संघकी नई मनोवृत्तिका परिणाम है, जिसने पुराने कानूनोंको अमल में लानेवाले अधिकारियोंकी बुद्धिको दूषित कर दिया है। वास्तवमें इस नवीन व्याख्याका तार्किक परिणाम यह हुआ है कि पहले जो-कुछ हो चुका है, उसकी वैधतापर आपत्ति की जा सकती है, और विरा- सत में मिली जायदादोंके वारिसोंको उनसे वंचित किया जा सकता है। भारतीय समाजको अचानक ऐसी उलझनमें डाल दिया गया है, जिससे वह एड़ी-चोटीका पसीना एक करके ही निकल सकता है; क्योंकि यदि सरकारी नीति हमारे द्वारा समय-समयपर प्रका-शित मामलोंसे प्राप्त पूर्वाभासके अनुरूप ही जारी रही तो, जबतक हम कड़े विरोधके लिए तैयार नहीं होते, वह नये विधानका सहारा लिये बिना ही या तो हमें समाप्त कर देगी या हमारे प्रगतिशील समाजको पंगु बना देगी।

शायद अब यह बात हमारी समझमें आ सकेगी कि लॉर्ड एमॉटने लॉर्ड ऍम्टहिलको जो उत्तर दिया उसमें इतनी झिझक और सावधानी क्यों बरती गई है।[] ये मामले लॉर्ड

 
  1. देखिए " हिन्दू और मुसलमान सावधान हो जायें", पृष्ठ ४९३-९४ और "भारतीय धर्मोपर हमला", पृ४ ४९४-९५।
  2. नेटालमें एक मुसलमानने अपने वसीयतनामे में अपनी सारी सम्पत्ति अपनी पत्नीके नाम छोड़ी थी। उत्तराधिकार-करका निश्चय करनेके लिए सर्वोच्च न्यायालयकी प्रान्तीय शाखाके "मास्टर" ने, पतिके कथनसे भिन्न, किसी दूसरे प्रमाणकी माँग की थी और सलाह दी थी कि इस मुद्दे पर सम्बन्धित पक्षोंको सर्वोच्च न्यायालयका निर्णय ले लेना चाहिए।
  3. देखिये पाद टिप्पणी १ पृष्ठ ४९२।