महोदयके मितभाषणका कारण तो अवश्य स्पष्ट करते हैं; परन्तु इससे उसका औचित्य सिद्ध नहीं होता। यदि वे जानते थे कि संघ-सरकार झुकेगी नहीं, और यदि लॉर्ड महोदयको हमारा जरा भी खयाल था तो जब लॉर्ड ऍम्टहिलने अवसर दिया था तब उन्हें स्थानीय सरकारके रुखकी कड़ी निन्दा करनी चाहिए थी।
- [अंग्रेजीसे]
- इंडियन ओपिनियन, २९-३-१९१३
३७३. भारतीय विवाह
केप टाउनमें चलाये गये विवाह-सम्बन्धी मुकदमेके बारेमें हम पिछले सप्ताह लिख चुके हैं। इसी प्रकारका एक दूसरा मुकदमा बाई जनूबीका हमारे ध्यानमें आया है। यह स्त्री विधवा है। उसके पतिने वसीयतनामे द्वारा अपनी मिल्कियत उसके लिए छोड़ी थी। परन्तु सर्वोच्च न्यायालयका मास्टर इस वसीयतनामेपर अमल करनेसे इनकार करता है। वह कहता है कि बाई जनूबीका विवाह विवाह नहीं माना जा सकता।[१] विवाहका यह प्रश्न इस तरह दिन-प्रति-दिन बहुत गम्भीर होता जा रहा है। और यदि हम सावधानीसे समय रहते कार्रवाई न करेंगे तो हमें बादमें पछताना पड़ेगा। सभी भारतीयोंपर इसका असर पड़ने की सम्भावना है। सुनते हैं, कुछ लोगों-की राय है कि स्त्रियोंके मामले में सत्याग्रह नहीं किया जा सकता; क्योंकि स्त्रियाँ जेल नहीं भेजी जा सकतीं। स्त्रियाँ जेल जा सकती हैं या नहीं, इस सवालको हम अभी एक ओर रखते हैं। परन्तु क्या पुरुष स्त्रियोंकी और अपनी प्रतिष्ठाको रक्षाके निमित्त जेल नहीं जा सकते ? स्त्रियोंको जेलमें भेजनेकी या जानेकी जरूरत पड़े ही, ऐसा नहीं है। पुरुषोंमें केवल मर्दानगी होनी चाहिए: फिर, सत्याग्रह में तो अभी देर है। संगठन करने, कुछ पैसा देने, सभाएँ बुलाने और प्रार्थनापत्र भेजने में सत्याग्रहका क्या सवाल है? इस सवालपर सत्याग्रह नहीं हो सकता, ऐसा बहाना निकालकर यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे, तो हमारी और हमारी स्त्रियोंकी फजीहत ही होगी।
- [गुजरातीसे]
- इंडियन ओपिनियन, २९-३-१९१३
- ↑ देखिए पाद टिप्पणी २, पृष्ठ ५०१ ।