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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तुमने बनियेको सिखानेका काम अपने ऊपर लिया होता तो ठीक ही होता । उससे तुम्हारी मानसिक अस्वस्थता कुछ दूर होती और उस कमाईसे एक तरहका सहारा मिलता ।
मेरे आनेकी बातको तनिक भी निश्चित मत समझना । स्त्रियों और बच्चोंके बारेमें सत्याग्रह छिड़ सकता है। मुझे लगता है कि उस हालतमें मुझे रुकना पड़ेगा । यदि सत्याग्रह हुआ तो तुम उसमें कैसे भाग ले सकोगे ? मुझे तुम्हारा वहाँसे आना ठीक नहीं जान पड़ता । तुम्हारे जानेका उद्देश्य माता-पिताकी सेवा करना है । उसे मुख्य मानकर जो उचित हो वह करना । इसी कारण तुम बड़ौदा या दूसरी जगह बुनाई सीखने के लिए नहीं जा सकते ।
स्वादको जीतने के सम्बन्धमें तुमने जो श्लोक उद्धृत किया है, वह मैंने देखा था। फिर भी मेरी टीका उपयुक्त ठहरती है। एक श्लोकसे कोई असर नहीं पड़ता । उन्होंने इस विषयको महत्व नहीं दिया है। यदि दिया होता तो हवेली' आदिमें हर किसी बहाने मिष्ठान्नके भोजन न होते, हर त्योहारके दिन घी और गुड़के सीधे न दिये जाते और ब्रह्म-भोज भी न होते । आधुनिक ऋषि या साधु स्वादेन्द्रियको नहीं जीतते, बल्कि वे उसके वशीभूत दिखाई देते हैं। यह विषय बहुत बड़ा है। यदि हम दोष निकालने की दृष्टिसे ऐसा कहें तो पापके भागी होंगे। परन्तु जब हमारा मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरोंका कल्याण करना होता है तब चाहे कोई कितना ही मान्य पुरुष क्यों न हो, उसमें भी अपूर्णता देखें तो उसपर विचार करना हमारा फर्ज है।
अब तुम्हारे एक पत्रका उत्तर समाप्त होता है। दूसरे पत्रोंका उत्तर फिर अर्थात् अगले हफ्ते लिखनेका प्रयत्न करूँगा । इस प्रकार तुम्हें हर हफ्ते लिख सकूंगा ।
यहाँ तो बहुत-कुछ होता है। उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उतना वक्त नहीं है । किन्तु तुम्हारे पूछे हुए सवालोंके उत्तरके सिलसिले में कुछ आ जायेगा ।
मणिलाल अपनी पढ़ाईमें व्यस्त रहता है। मैं उसे एक घड़ीकी भी फुरसत नहीं लेने देता । वह तुम्हें पत्र लिखेगा, यह आशा व्यर्थ है। तुम उसे पत्र लिखो तो सम्भव है, वह उत्तर दे दे। जेकी भी व्यस्त तो रहती ही है; फिर, वह पत्र लिखने में ढीली है और उसे पत्र लिखना आता भी नहीं, इसलिए उससे भी आशा कम ही रखना ।
मोहनदासके आशीर्वाद
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५६४३) से । सौजन्य : नारणदास गांधी
१. वल्लभ सम्प्रदायका वैष्णव मन्दिर ।