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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७०

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५३२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है । या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने- अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है । यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राटको सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ । मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं । यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...। उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है । आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं, वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थ-व्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही । यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है । और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है। ...l १८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा । किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है । फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, मैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है । अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि " इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे Gandhi Heritage Porta