५३४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..। [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११ ख साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित किये थे : ध्यान जिस बातकी हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशों के हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंको भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनको परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं। और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते। मेरे खयालते यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा- मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी । । एक उज्ज्वलतम और समान ही राजभक्त मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७२
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