५५४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मामूली-सी परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं; और इसी तरह ट्रान्सवाल या केपके जो एशियाई नेटालमें प्रवेश करना चाहते हों, वे नेटाल कानूनके अन्तर्गत परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं । इस तरह वे केप या नेटालमें प्रवेश पा सकते हैं, क्योंकि इन प्रान्तोंमें एशियाइयोंके प्रवासके बारेमें कोई कानून नहीं है; पर चूँकि ट्रान्सवाल और फ्री स्टेटमें है इसलिए एशियाई लोग आजकल ट्रान्सवाल और फ्री स्टेटमें नहीं जा सकते । माननीय सदस्य इस विषमताको समझ सकते हैं और ब्रिटिश सरकारने हमसे कहा है कि इस विधेयकको इस तरह लागू न किया जाये कि एशियाइयोंकी हालत बदतर हो जाये । विधेयकके अंतर्गत तो एशियाइयोंकी अन्तर्प्रान्तीय गतिविधियोंपर प्रतिबन्ध लगाये गये हैं, किन्तु ब्रिटिश सरकारने कहा है कि वास्तविक प्रशासन इस ढंगसे किया जाये कि कानूनमें केप और नेटाल्के बारेमें जितने की व्यवस्था की गई है उससे अधिक प्रतिबन्ध न लगाये जा सकेँ । ट्रान्सवालकी स्थितिके सम्बन्धमें मन्त्रीने कहा कि वहाँ “हमें कोई बाधा नहीं है और हम इस प्रान्तमें संघके अन्य हिस्सोंसे एशियाइयोंका प्रवेश रोक सकते हैं । " हम संघके भीतरी प्रान्तोंमें अपना कानून लागू करना चाहते हैं, पर हम इसके लिए तैयार हैं कि उसे अमल में लानेमें वर्तमान कानूनके अन्तर्गत अभीतक जितनी सख्ती बरती जाती रही है उससे अधिक न बरती जाये । अब प्रश्न उठता है कि इस विधेयक के कानून बन जानेपर फ्री स्टेट-जैसे प्रान्तमें वास्तविक स्थिति क्या होगी । वह स्थिति यही होगी कि इस अधिनियमके अन्तर्गत एशियाइयोंको एक सीमित संख्या में प्रतिवर्ष संघ में प्रवेश करने दिया जायगा, बशर्ते कि ऐसे एशियाई शिक्षित या शिक्षा-साध्य पेशेवाले लोग हों और उतनी ही संख्यामें आये जितनेकी सरकार मंजूरी दे | अब अगर इस प्रकार प्रवेश करनेवाले एशियाई चाहेंगे, तो वे संघके किसी भी प्रान्तमें और फ्री स्टेटमें भी बस सकेंगे; किन्तु फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनको व्यवस्थाओंके अनुसार वे कुछ विशेष प्रकारके व्यापार और धन्धे नहीं कर सकते और न भू-सम्पत्तिके स्वामी ही हो सकते । यदि वे वहाँ जाना भी चाहेंगे तो ये सारे प्रतिबन्ध और वहाँ लगाई जानेवाली सभी निर्योग्यताएँ उनपर लागू रहेंगी । यदि धारा २८ से पूरी तरह सन्तोष न होता हो तो मैं इसे अधिक स्पष्ट बनानेके लिए इसमें यह संशोधन शामिल करनेको तैयार हूँ कि एशियाइयोंको संघमें कहीं भी, फ्री स्टेटमें भी, जानेकी छूट तो रहेगी पर फ्री स्टेटमें वे ऐसे किसी भी अधिकारका उपभोग नहीं कर सकेंगे जिससे वे फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनमें आजकल वंचित हैं । फ्री स्टेटमें कुल मिलाकर इसका नतीजा यह होगा कि गोरोंकी दृष्टिसे स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी, क्योंकि फ्री स्टेटका मौजूदा कानून सचमुच ही बड़ा ढीला-ढाला है । फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनके अनुसार कोई भी एशियाई प्रान्तमें प्रवेश तो कर सकता है पर उसे अपने प्रवेशके दो महीनेके अन्दर वहाँ बने रहने की अनुमतिके लिए प्रार्थनापत्र दे देना चाहिए । अनुमति मिल जानेपर ही वह रह सकता है, लेकिन एक बार द्वार तो खुल जाता है । एशियाई लोग पहले तो फ्री स्टेटमें प्रवेश कर लेते हैं और उसके दो महीने बाद बनेकी अनुमति ले लेते हैं । यह बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण व्यवस्था है, क्योंकि यदि लोगोंको प्रान्त में आनेसे रोकना हो तो उनको सीमापर ही रोक देना सबसे अच्छा होगा । एक बार प्रवेश पा लेनेके बाद उनको निकालना काफी मुश्किल हो जाता है । लेकिन इसके बाद अब फ्री स्टेटमें स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी । मन्त्रीने अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि प्रवासी विभागके प्रशासनके बारेमें जब-तब काफी असन्तोष पैदा हो जाता है । विभागके अधिकारी बड़े योग्य और मेहनती हैं, पर हैं तो आखिर आदमी ही । उनसे कभी-कभी गलतियाँ भी हो जाती हैं, जिनको लेकर जनतामें कुछ चीख-पुकार मचने लगती है । वे जो निर्णय करते हैं, उनकी कभी-कभी आलोचना की जाती है, परन्तु इससे बचा जा सकता है, और इसलिए मैं कुछ स्थानोंपर सलाहकार निकाय नियुक्त करना चाहता हूँ । संघमें रेल या जहाज द्वारा प्रवेश करनेके हर केन्द्र के लिए एक-एक निकाय नियुक्त करना तो मुमकिन नहीं, लेकिन केप टाउन और डर्बनमें ऐसे निकाय बना देना चाहिए जो प्रवासी अधिकारियों द्वारा प्रवेश करनेसे रोके जानेवाले लोगोंके मामलोंपर विचार Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९२
दिखावट