सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

५५६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय ठेस पहुँचाना ही उसका एकमात्र उपयोग है । अतः अल्पवयस्कोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखते हुए उस अधिनियमको रद किया जाना था तथा एशियाइयोंके प्रवासको प्रतिबन्धित करनेके सिद्धान्तको इस प्रकार समाविष्ट किया जाना था कि जातीय भेदभावको उपनिवेशमें मान्यता न मिले। और प्रतिबन्धकी बातसे भारतीयोंने स्वयं सहमति व्यक्त की थी और इसे अनिवार्य ही नहीं उचित भी माना था । भारतीयोंकी केवल यही एक मांग रही है कि रंगके आधारपर उनके साथ भेदभाव न किया जाये । उनका कहना है : " यदि आप हमें उपनिवेशमें प्रवेश नहीं ही देना चाहें तो प्रशासकीय तौरपर भेदभाव करके वैसा कीजिए । या फिर आप आर्थिक सुविधाके आधारपर वैसा कीजिए, किन्तु स्पष्ट रूपसे यह कहकर तो मत कीजिए कि हम एक निम्नतर प्रजातिके लोग हैं ।" हमें तो आशा थी कि समझौता बहुत पहले ही कार्यान्वित हो जायेगा । उसे दो बार स्थगित किया जा चुका है। इसलिए मैं सबसे पहले तो यही जानना चाहूँगा कि इसे स्थगित करनेके ठीक-ठीक कारण क्या हैं और इसके बाद मैं जानना चाहूँगा कि क्या सम्राट्की सरकार समझती है कि संघ-संसद् में हालमें जो विधेयक पेश हुआ है वह वास्तवमें समझौते की उन शर्तोंको पूरा करता है जिनका मैंने उल्लेख किया है । मुझे मालूम है कि दक्षिण आफ्रिकाके कई बड़े अधिकारी वकील कहते हैं कि यह विधेयक उन सीधी-सादी और स्पष्ट शर्तोंको पूरा नहीं करता, बल्कि एक दूसरे रूपमें प्रजातिगत भेदभावको बरकरार रखता है । इसके बारेमें सम्राटको सरकारकी क्या राय है ? और यदि उसकी रायमें यह उन शर्तोंको पूरा नहीं करता तो इसे ठीक करनेके लिए वह क्या कदम उठाने जा रही है ? और यह भी कहा गया है कि यह विधेयक तटवर्ती प्रान्तोंके भारतीयोंको उन अधिकारोंसे भी वंचित करता है, जिनपर अभीतक किसीने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी। हो सकता है कि यह बात गलत हो, पर इसके बारेमें भी मैं माननीय मन्त्रीसे सूचना चाहता हूँ । वे बताये कि सचाई क्या है । मेरा खयाल है कि सम्राट्की सरकारने अक्टूबर १९१० के अपने खरीतेमें कहा था कि ट्रान्सवाल्के भारतीयोंकी समस्याके हलके रूपमें ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जायेगा जो अन्य प्रान्तों में भारतीयोंके अधिकारों को कम करता हो । दक्षिण आफ्रिकी सरकार संघ बननेके काफी पहलेसे लगातार यही कहती आई है कि वह इस देशमें विधिपूर्वक निवासी बन चुके भारतीयोंके अधिकारोंमें कोई कमी नहीं करना चाहती । जब लॉर्ड सेल्बोर्न [ दक्षिण आफ्रिकामें ] उच्चायुक्त थे, उन दिनों इस विषयसे सम्बन्धित उनके सभी भाषणोंका मुख्य स्वर यही बात थी; उन्होंने कहा था कि वे इस देशमें विधिपूर्वक निवासी बन चुके भारतीयोंके साथ पहलेकी बनिस्बत किसी भी तरह कम अच्छा बरताव नहीं करना चाहते । वे केवल एक इस चीज पर अड़े रहे कि समाजके सहज-सुखद जीवनके लिए जिन पादरी-पुजारियों, डॉक्टरों और वकीलोंकी आवश्यकता है ऐसे कुछ उचित अपवादोंको छोड़कर बाकी किसी भारतीयको प्रवेश नहीं दिया जायेगा; और अब तो अपवादकी श्रेणीमें आनेवाले उन लोगोंके प्रवेशके बारेमें सभी दल सहमत हैं । समाजको आवश्यकताओंको देखते हुए प्रति वर्ष अधिकसे-अधिक छः लोगोंको प्रवेश देना उचित माना गया। आशा है कि इस नये विधेयकको समुचित जाँच-परखके बाद यह निष्कर्ष नहीं निकाला जायेगा कि यह वास्तवमें इस देशके भारतीयोंके मौजूदा अधिकारोंमें कटौती करता है, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो यह बहुत ही गम्भीर और अक्षम्य विश्वासघात होगा । इसलिए मुझे भरोसा है कि हम यही सुनेंगे कि सम्राट की सरकारने इस दृष्टिसे विधेयककी बड़ी सावधानीसे जाँच-परख कर ली है और वह इस मुद्देपर संघ-सरकारके साथ मैत्रीपूर्ण ढंगसे लिखा-पढ़ी कर रही है । अपना प्रश्न पूछनेकी सफाईमें मैं एक बात और कहना चाहता हूँ । वह यह कि जिस समझौतेके बारेमें हमसे तब कहा गया था कि बस होने ही वाला है उसको इतने दिन तक स्थगित करते जानेके इस कालमें समझौते की भावनाका उल्लंघन हुआ है, ऐसा लगता है । भारतीय समाज सत्याग्रह आन्दोलनका अपना विचार त्यागने के लिए इसीलिए सहमत हो गया था कि हमें यह आशा बँधाई गई थी कि समझौता फौरन ही Gandhi Heritage Portal