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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 14.pdf/१२

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छः प्रतिज्ञा लिवानेकी सावधानी भी बरती। जब संघर्ष अनिवार्य हो गया तब गांधीजी पूरे जोरसे मजदूरोंके पक्षकी हिमायत करने लग गये। और उन्होंने आगे बढ़कर उनका सक्रिय नेतृत्व भी संभाल लिया । लड़ाईके सिलसिलेमें उन्होंने प्रतिदिन मजदूरों और मालिकों, दोनोंको तालीम देनेकी गरजसे पत्रिकाएँ निकाली। मजदूरोंसे उन्होंने अपना संघर्ष सत्या- ग्रहकी भावनासे चलानेके लिए कहा और मालिकोंसे हृदय परिवर्तनका अनुरोध किया । उन्होंने मजदूरोंको दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके संघर्षकी याद दिलाई और वलिअम्मा तथा हरवतसिंहकी आत्माहुतिका स्मरण कराया। मजदूरोंका ध्यान उनकी त्रुटियोंकी ओर आकृष्ट किया, उन्हें बताया कि वेतन वृद्धिके इस संघर्षको वे अपने रहन-सहनको सुधारने और अपना जीवन ज्यादा सुसंस्कृत बनानेके बृहत् प्रयत्नका एक हिस्सा मानना सीखें। और जब उन्होंने उन्हें कठिनाइयोंके सम्मुख लड़खड़ाते हुए देखा तो उनके ध्येयकी सफलताके लिए अपनी आहुति देनेकी तत्परता प्रदर्शित करते हुए अनिश्चित कालके लिए उपवासकी घोषणा कर दी । यों, उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि उपवासमें मिल मालिकोंपर दबाव डालनेका हेतु बिलकुल नहीं है, किन्तु उन्होंने यह स्वीकार किया कि उसका यह असर होगा अवश्य और इसलिए जब मिल-मालिक झुके तो गांधीजीने इस परिस्थितिका पूरा लाभ उठानेसे, मजदूरोंकी माँगोंकी पूरी स्वीकृतिका आग्रह करनेसे, इनकार कर दिया । उनका यह रवैया कुछ मजदूरोंको शायद बुरा भी लगा, लेकिन गांधीजीने उन्हें समझा- बुझाकर शान्त कर दिया। इस तरह संघर्षका अन्त जिस प्रकार हुआ उसमें समझौतेकी वह भावना विद्यमान थी जो गांधीजीके सत्याग्रहका अविच्छेद्य अंग थी । मिल मजदूरोंकी हड़तालसे मुक्त होते-न-होते गांधीजीके सामने सरकारसे पहली बार डटकर भिड़ने की सम्भावना उपस्थित हो गई। गुजरातके खेड़ा जिलेमें फसलको बाढ़ से बहुत नुकसान हुआ था और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओंको ऐसा महसूस हुआ कि परिस्थितियोंको देखते हुए किसानोंको मालगुजारी कानूनकी रू से लगानकी पूरी या आंशिक छूट मिलनी चाहिए। किन्तु सरकार इस मामलेमें लोगोंकी बातको अनसुनी कर रही थी। गांधीजी अभी चम्पारनमें ही थे, जब इस सम्बन्धमें उनकी सलाह माँगी गई । चम्पारनसे लौटकर आनेके बाद उन्होंने लोगोंकी इस शिकायतमें सक्रिय दिलचस्पी लेना शुरू किया। उन्होंने फसलकी हालत घूम-फिरकर स्वयं जानी- परखी और अन्तमें वे इस निष्कर्ष- पर आये कि लगानकी छूटकी लोगोंकी माँग वाजिब है। अधिकारियोंको इस सम्बन्धमें प्रतिवेदन प्रेषित किये गये किन्तु उनसे उनके सहानुभूति-शून्य रवैयमें कोई फर्क नहीं पड़ा । तब गांधीजीने लोगोंको सक्रिय प्रतिरोधकी सलाह दी । "मुझे तो यह बात बिलकुल स्वयंसिद्ध-सी लगती है कि अन्यायके खिलाफ अपनी भावना प्रकट करनेके लिए नम्रता- पूर्वक लगान देनेसे इनकार करने और सरकारको उसे जबरदस्ती वसूल करने देनेमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है । (पृष्ठ २०४) । २२ मार्चको नडियादकी एक सार्वजनिक सभामें बोलते हुए उन्होंने लोगोंको अपनी इस लड़ाईको एक बृहत्तर सिद्धान्तकी स्थापनाके लिए लड़ी जा रही लड़ाईका रूप देने और लगान देनेसे इनकार करनेकी प्रतिज्ञा लेनेके लिए आहूत किया। उन्होंने कहा: “ इस देशमें यह नियम ही बन गया है कि सरकारका मत हमेशा ठीक होना चाहिए। लोग चाहे जितने सचाईपर हों तो भी Gandhi Heritage Portal