सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 14.pdf/१४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

आठ बिना शर्त सहयोगकी इस नीतिकी बुद्धिमत्तामें सन्देह था । और जब बम्बईमें १० जून को प्रान्तीय युद्ध परिषद्के दौरान बम्बईके गवर्नर लॉर्ड विलिंग्डनने लोकमान्य तिलक और केलकरको उनके भाषणोंके बीचमें रोक दिया, उस समय गांधीजीके लिए परिस्थिति निश्चय ही बहुत अटपटी हो गई होगी। उन्होंने इस मामलेको तुरन्त अपने हाथमें लिया, और गवर्नरसे साफ कहा कि उनका वैसा करना बहुत गलत था । जनताकी ओरसे गवर्नरके इस विवेकहीन व्यवहारकी जो टीका की गई उसमें गांधीजीने मुख्य हिस्सा लिया और राष्ट्रके सम्मान्य नेताके इस अपमानको राष्ट्रका अपमान मानते हुए उन्होंने गवर्नरसे क्षमा-याचनाकी माँग की। किन्तु सरकारके युद्ध प्रयत्न में जनता के सहयोगकी माँग वे फिर भी करते रहे ; यहाँ तक कि उन्होंने खेड़ा जिलेमें लोगोंको सेनामें भरती होने के लिए प्रोत्साहित करते हुए जोरदार मुहिम चलाई जिसका उनके स्वास्थ्यपर बहत खराब असर पड़ा । अहिंसाका सन्देशवाहक सेनामें भरती होनेकी पैरवी करे, यह बात लोगोंको, जैसा कि स्वाभाविक है, असंगत मालूम होती थी। इस असंगतिके लिए मित्रों तकने गांधीजीकी आलोचना की। गांधीजीने अपनी स्थितिका स्पष्टीकरण करते हुए कहा कि कायरताको छिपाने के लिए अहिंसाकी शरण नहीं ली जा सकती; में अपने लिए तो किसी भी परिस्थिति में हिंसाका वर्जन करूँगा किन्तु मेरी तरह जो अहिंसाको परम धर्म नहीं मानते उन्हें में यही सलाह दूंगा कि वे भय या दुर्बलताके कारण हिंसासे न हिचकें। हिंसा-अहिंसाके सवालपर गांधीजीका यह स्पष्टीकरण उनकी शिक्षाका एक आव- श्यक अंग है और यह बात उन्होंने बादमें अनेक अवसरोंपर दुहराई। उन्होंने कहा, अगर भारतीय जनता ब्रिटेनके साथ अपने सम्बन्धोंका लाभ उठाते रहना चाहती है तो उसे साम्राज्यकी रक्षामें अपना योग अवश्य देना चाहिए। किन्तु देशकी राजनीतिक आकांक्षाओंकी सिद्धिके लिए वे सत्याग्रहको ही एकमात्र उपाय मानते रहे। एक सार्वजनिक कार्यकर्त्ताको उन्होंने लिखा, “अवसर आनेपर अपनी शक्ति-भर सत्याग्रहकी महिमाको प्रदर्शित करना हमारा परम धर्म है।” (पृष्ठ १३०) । फिर इन्दौरमें, ३० मार्चके अपने एक भाषण में उन्होंने घोषित किया, “हम अगर भारतका उद्धार कर सकते हैं तो सत्य और अहिंसासे ही कर सकते हैं। (पृष्ठ २८३) लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मानवीय जीवनकी विविध परिस्थितियोंमें जब अहिंसाके मार्गका अनुसरण किया जाता है तो हमें ऐसे अनेक जटिल नैतिक प्रश्नोंका मुकाबला करना पड़ता है जिनका कोई सीधा हल नहीं है। "हिमालयपर सीधी लकीरसे जा ही नहीं सकते। क्या इसी तरह अहिंसाका मार्ग भी विकट होगा ? " (पृष्ठ ४९८) बड़ी राष्ट्रीय समस्याओंपर गांधीजीने जितना ध्यान दिया उतना ही दिखने में छोटी समस्याओं पर भी । उन्होंने गोरक्षाके विवादास्पद प्रश्नको प्राणि-जगत्के प्रति करुणा और उसके कल्याणकी चिन्ता के साथ जोड़कर उसे ज्यादा सही परिप्रेक्ष्य प्रदान करनेका प्रयत्न किया। उन्होंने गायोंकी नसल सुधारने, बैलोंके साथ सदयताका बरताव करने, आदर्श गोशालाएं आदि चलानेपर जोर दिया जो कि इस समस्याके प्रति उनकी रचनात्मक दृष्टिका निदर्शक है। एक और महत्वपूर्ण प्रश्न, जिसपर उन्होंने इस समय अधिकाधिक ध्यान दिया, शिक्षाका था। अंग्रेजी शासन दे ने इस देशमें जिस शिक्षा-प्रणालीकी स्थापना की उससे वे अनेक कारणोंसे असन्तुष्ट थे, किन्तु उन्हें सबसे ज्यादा आपत्ति Gandhi Heritage Portal